
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल व जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने अपने एक अहम आदेश में कहा कि यदि पीडि़ता की आयु को लेकर पुख्ता प्रमाण न हों और वह संदेह के दायरे में हो, तो मात्र अंकसूची में अंकित जन्मतिथि को सजा का ठोस आधार नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा कि जब उम्र के साक्ष्य ही विवादास्पद हों, तो मार्कशीट को अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं है। युगलपीठ ने कहा कि पीडि़ता के बालिग होने की प्रबल संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके चलते ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई सजा को निरस्त कर दिया गया।
अभियोजन के अनुसार रायसेन जिले के बाड़ी थाना में नर्मदापुरम के पिपरिया निवासी दिनेश वर्मा लोधी पर अपहरण और दुष्कर्म के आरोप लगे थे। इस प्रकरण में निचली अदालत ने 21 फरवरीए 2025 को अपना आदेश सुनाते हुए आरोपी को दोषी करार दिया था। उसे 15 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील प्रस्तुत की थी। उसकी ओर से दलील दी गई कि पीडि़ता घटना के समय वयस्क थी और उसने अपनी स्वेच्छा से आरोपी के साथ जीवन व्यतीत करने का निर्णय लिया था। सुनवाई के दौरान दस्तावेजों के सूक्ष्म परीक्षण में कई खामियां उजागर हुईं। न्यायालय ने पाया कि स्कूल के दाखिल खारिज रजिस्टर में जन्मतिथि के महीने वाले कालम में ओवर राइटिंग की गई थी। संबंधित स्कूल के शिक्षक ने भी गवाही में स्वीकार किया कि बिना किसी आधिकारिक प्रमाण पत्र के केवल पिता के मौखिक कथन के आधार पर जन्मतिथि दर्ज की गई थी। पीडि़ता के पिता ने भी अदालत में माना कि बच्चों की जन्मतिथि केवल अनुमान के आधार पर लिखवाई गई थी। यह तथ्य भी सामने आया कि पीडि़ता और आरोपी ने आठ मार्च 2021 को बोरास मंदिर में रीति-रिवाज से विवाह किया था और वे वैवाहिक जीवन जी रहे थे। पीडि़ता ने स्वयं अपने बयानों में किसी भी प्रकार की जबरदस्ती या गलत घटना से साफ मना किया था और अपनी आयु 19 वर्ष बताई थी।
