जनप्रतिनिधि परिदृश्य में सुधार के साथ महत्वपूर्ण विधेयकों को पेश करने की सरकार की तैयारी

नयी दिल्ली, (वार्ता) सरकार लोकसभा में नया संविधान संशोधन विधेयक सहित कई महत्वपूर्ण विधायकों को प्रस्तुत करने और उन पर चर्चा करने का प्रस्ताव लाने की तैयारी में है जिससे लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं में बदलाव करने के साथ-साथ विधायिका में सीटों की संख्या में वृद्धि की जा सकेगी।

इनके जारिये केंद्र शासित प्रदेशों के कानूनों में संशोधन का के प्रस्ताव भी है। ये संशोधन भारत के चुनावी परिदृश्य को नया रूप देने के लिए केंद्र द्वारा एक बड़े प्रयास का संकेत देते हैं।

लोकसभा की गुरुवार (16 अप्रैल की) आधिकारिक कार्यसूची के अनुसार, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल संविधान में संशोधन करने के उद्देश्य से संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक, 2026 पेश करेंगे। वह लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं की सीटों के फिर से परिसीमन के लिए विधेयक भी पेश करेंगे जिसके लागू होने पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों को फिर से परिभाषित करेगा।

लोकसभा की कार्यवाही के एजेंडा के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कल ही केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश करेंगे, जिसमें दिल्ली और जम्मू-कश्मीर सहित केंद्र शासित प्रदेशों को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानूनों में बदलाव का प्रस्ताव है।

ये तीनों विधेयक आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं, और सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रस्तावित परिसीमन का काम और केंद्र शासित प्रदेशों के कानूनों में संशोधन संविधान संशोधन के पारित होने पर निर्भर हैं।

इसे सुविधाजनक बनाने के लिए श्री मेघवाल लोकसभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमों के नियम 66 के तहत एक प्रावधान को एक बार के लिए निलंबित करने की मांग वाला प्रस्ताव पेश कर सकते हैं, ताकि संबंधित विधेयकों को एक साथ लिया जा सके।

प्रस्ताव में कहा गया है, “ये उपाय परस्पर जुड़े हुए हैं और उनके प्रभावी विचार के लिए प्रक्रियात्मक लचीलेपन की आवश्यकता है। यह प्रस्ताव विधायी प्रक्रिया को तेज करने के केंद्र के इरादे को उजागर करता है। ”

तीनों विधेयक विचार और पारित करने के लिए भी सूचीबद्ध हैं। प्रस्तावित परिसीमन की कवायद के दूरगामी परिणाम होने की संभावना है, क्योंकि यह बदलाव जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा सीटों के पुनर्वितरण को निर्धारित करेगा। क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए यह प्रक्रिया दशकों से रुकी हुई है। अंतिम प्रमुख परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर 2002 में किया गया था।

यह कदम जनप्रतिनिधित्व, संघीय व्यवस्था में संतुलन और भारत के चुनावी मानचित्र के भविष्य के स्वरूप को लेकर बढ़ती राजनीतिक बहस के बीच उठाया जा रहा है ।

विपक्षी दलों ने अलग-अलग जनसंख्या वृद्धि दर वाले राज्यों पर परिसीमन के संभावित प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त की है। यदि ये विधेयक पारित हो जाते हैं तो यह हाल के वर्षों में भारत की प्रतिनिधि प्रणाली के सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक हो सकते हैं।

 

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