सुनवाई का अवसर नहीं देना मौलिक अधिकारों का हनन: हाईकोर्ट  

जबलपुर। हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि सुनवाई का अवसर दिये बिना बर्खास्त किया जाना मौलिक अधिकारों का हनन है। हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने एफआईआर दर्ज होने तथा 48 घंटो से अधिक निरूध्द रहने के कारण संविदा कर्मचारी को नौकरी के हटाये जाने के आदेश को निरस्त कर दिया है।

सिहोर निवासी गोपाल सिंह की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि उसकी नियुक्ति संविदा कर्मचारी के रूप में ग्राम कुंडियानातु में ग्राम रोजगार सहायक पद पर साल दिसम्बर 2012 को हुई थी। इस बाद उसके खिलाफ एक अपराधिक प्रकरण दर्ज होने के कारण सीईओ जनपद पंचायत आष्टा ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया। जिसके खिलाफ उसने कलेक्टर के समक्ष अपील दायर की थी। कलेक्टर ने अपने आदेष में माना कि मध्य प्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद द्वारा जारी निर्देशों के क्लॉज 16(1) में, यह साफ तौर पर लिखा है कि अगर किसी कर्मचारी के खिलाफ नामजद थ्प्त् दर्ज होने पर उसे 48 घंटे से ज्यादा जेल में रखा जाता है, तो संविदा सेवा को समाप्त किया जा सकता है।

याचिकाकर्ता को न्यायालय ने अपराधिक प्रकरण में दोषमुक्त कर दिया था। जिसके खिलाफ उसने संभागायुक्त के समक्ष आवेदन दायर किया था। संभागायुक्त ने उसके आवेदन को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी का डर था, इसलिए वह ग्राम पंचायत को बताए बिना गैरहाजिर रहा। धारा 18(6) में उल्लेख है कि अगर कोई संविदा कर्मचारी बिना इजाजत के एक महीने से अधिक समय तक अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सेवा अपने आप खत्म हो जाएगी। . कलेक्टर के द्वारा पास किए गए ऑर्डर को देखने पर पता चला कि पिटीशनर 30 अक्टूबर 2013 से अनुपस्थित था और बर्खास्ती आदेश 09 नवम्बर 2013 को जारी किया गया था। याचिकाकर्ता बिना जानकारी के 30 दिन से ज्यादा ड्यूटी से अनुपस्थित नहीं था। एकलपीठ ने याचिका का निराकरण करते हुए अपने आदेश में कहा है कि ने 18(6) के तहत कोई भी ऑर्डर पास करने से पहले, ग्राम रोजगार सहायक को गैरहाजिरी का कारण पूछते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया जाएगा। याचिकाकर्ता के जवाब पर विचार करने और कानून के अनुसार नए ऑर्डर जारी किये जाये।

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