मध्य क्षेत्र की डायरी
दिलीप झा
मध्यप्रदेश में खनन माफिया इतना बेलगाम और बेखौफ हैं वह किसी को भी कहीं भी कुचलकर मार देता है और उस व्यक्ति का कुछ नहीं होता है। खनन में लगे ट्रेक्टर ट्राली के ड्राइवर की इतनी हिमाकत कि वह सिपाही को कुचल दें,यह बिना किसी राजनीतिक रसूखदार के कतई संभव नहीं है। सरकार का मतलब जनता की, जनता के लिए और जनता के द्वारा चुनी गई सरकार की अवधारणा जब खंडित होने लगे तो समझ लीजिए कि प्रशासनिक व्यवस्था लचर ही नहीं चरमराई हुई है।
पिछले तीन दशकों से पूरे प्रदेश में रेत माफिया अवैध खनन से सरकार को चूना लगा रहे हैं और प्रशासन अगर चुपचाप है तो यह गंभीर मामला है। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
खनन माफिया पूरे सिस्टम का उत्खनन कर रहा है और हमारा प्रशासनिक सिस्टम हाथ पर हाथ धरकर लाचार बना हुआ है तो यह शासन के लिए बेहद चिंताजनक है। जब जनता सरकार से नाउम्मीद होने लगे और यह कहने लगे कि भगवान ही मालिक है इस राज्य का तो समझ लीजिए कि जनता का सरकार पर से भरोसा टूटने लगा है। इससे भी कोई इंकार नहीं कर सकता कि लोगों का एक बार जब भरोसा टूट जाता है तो फिर उसे बनाने में वर्षों लग जाते हैं।
सिपाही को कुचलकर मारने की घटना पूरे देश में आग की तरह फ़ैल जाती है। पुलिस हमारी सुरक्षा के लिए है लेकिन जब वही सुरक्षित नहीं है तो हम और हमारे नेताओं कैसे सुरक्षित रहेंगे यह एक यक्ष सवाल है। आखिर अपराधियों को खाद पानी देने वाले कौन लोग जो बीजेपी की छवि से खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्हें चिन्हित करने कर बीजेपी से बाहर करने की नितांत आवश्यकता है। हैरानी की बात है कि ट्रैक्टर से वनरक्षक हरिकेश गुर्जर की कुचलकर हत्या करने वाला ड्राइवर आधा किलोमीटर दूर पेट्रोल पंप पर ट्रॉली खाली किया और खेत में कपड़े बदलकर फरार हो गया। इस घटना ने जिला प्रशासन के कामकाज पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अपराधियों के सामने जब जिला प्रशासन घुटने टेक तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है मुरैना की राजनीति का अपराधीकरण हो गया है।
लेकिन हमारी पूलिंस इनका कुछ नहीं कर पा रही है। वर्ष 2015 में भी खनन माफिया ने एक पुलिसकर्मी को कुचलकर मार दिया था।ग्वालियर संभाग के कई जिलों के अलावा जबलपुर, सिवनी, नरसिंहपुर, उमरिया, शहडौल, बालाघाट, पन्ना, छतरपुर, नर्मदापुरम, दमोह, विदिशा एवं सीहोर में खनन माफिया के कारनामे किसी से छिपी नहीं है।
कर्ज में डूबा प्रदेश
चार्वाक ने कहा था कि अगर स्वर्ग में भुगतान के लिए यदि उधार लेकर भी घी खाना पड़े तो खाना चाहिए l मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार ने तो इस जन्म में ही उधार लेकर घी पीना शुरू कर दिया है, क्योंकि उसे मालूम है कि इस कर्ज को चुकाने के लिए तो प्रदेश की जनता को ही टैक्स के कोल्हू में पीस कर तेल निकाला जाने वाला है l सरकार विकास के ऊंचे दावे कर रही है, तब हकीकत यह है कि वर्ष 2025-26 के वित्त वर्ष में प्रदेश सरकार ने हर रोज 250 करोड़ रुपए कर्ज लेकर सरकारी ढांचे को चलाया है l इस वित्त वर्ष में सरकार ने 91500 करोड़ रुपए का कर्ज लिया है l
स्थिति यह है कि प्रदेश पर कुल कर्ज 5.56 लाख करोड़ को पार कर गया है l प्रदेश की कुल जनसंख्या 9 करोड़ के आसपास है l
इसका अर्थ यह है कि प्रदेश का प्रत्येक नागरिक पर 6.17 लाख का कर्जदार है I दूसरी ओर अभी विधानसभा में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 1.69 लाख रुपये है l इसका अर्थ यह है कि यदि प्रदेश के सारे नागरिकों की सारी आय भी कर्ज चुकाने के लिए दी जाए तो भी इसे चुकाने में चार साल लगेंगे | प्रश्न यह कि क्या ऐसा करने पर प्रदेश कर्ज मुक्त हो जाएगा? ऐसा इसलिए नहीं हो पाएगा, क्योंकि वर्तमान कर्ज पर 12 प्रतिशत की ब्याज दर से हर साल 66,720 करोड़ रुपए तो ब्याज ही देना पड़ेगा | दूसरी बात यह है कि क्या राज्य सरकार नया कर्ज लेना बंद कर देगी? वह तो अप्रैल महीने में ही फिर कर्ज लेने का प्रस्ताव तैयार कर रही है I
यह कर्ज भाजपा सरकार प्रदेश की जनता के कल्याण के लिए ले रही है? तो फिर प्रदेश में विकास कहां है? किसानों को मंडियों में उनकी खून पसीने की मेहनत की कमाई की कीमत नहीं मिल रही है I मजदूरों कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा है l आशा उषा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अपने मानदेय वृद्धि के लिए लड़ रही हैं। कर्ज के इस पैसे से जो बिल्डिंग बनाई जा रही है, नेताओं, नौकरशाहों और ठेकेदारों की तिकड़ी के भ्रष्टाचार से बनने वाले पुल उद्घाटन के साथ ही टूट रहे हैं l सड़के पहली ही बारिश में धस रही हैं l बाँध टूट रहे हैं, भवनों की छतें पहली ही बारिश में टपक रही हैं l जबकि सच्चाई यह है कि स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं l अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं l सरकारी विभागों में लाखों पद खाली पड़े हैं I प्रदेश की जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से इस कर्ज के बोझ को उतारा जाएगा ,यह एक बड़ा सवाल है।
