हैदराबाद | ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच जारी भीषण संघर्ष ने न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था, बल्कि पृथ्वी के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को भी तबाही के कगार पर खड़ा कर दिया है। 34 दिनों से जारी इस जंग में लाखों टन गोला-बारूद और मिसाइल हमलों के कारण भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस युद्ध की वजह से वैश्विक तापमान में 2.3 से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो सकती है। तेल रिफाइनरियों और गैस डिपो पर हो रहे हमलों से निकलने वाला काला धुआं और जहरीले कण हवा में घुलकर कैंसर, दिल और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों का कारण बन रहे हैं। तेहरान समेत कई क्षेत्रों में ‘काली-तेजाबी बारिश’ (Black Rain) दर्ज की गई है, जो जलते तेल से निकले रसायनों और राख का जानलेवा मिश्रण है।
फारस की खाड़ी और लाल सागर में चल रही सैन्य गतिविधियों ने जलीय जीवन को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। अमेरिका और ईरान द्वारा एक-दूसरे के नौसैनिक जहाजों और बंदरगाहों को निशाना बनाने से समुद्र में बड़े पैमाने पर तेल रिसाव (Oil Spill) हो रहा है, जिससे दुर्लभ समुद्री जीवों, कछुओं और प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) का अस्तित्व खतरे में है। इसके अतिरिक्त, विलवणीकरण संयंत्रों (Desalination Plants) पर हमलों से मीठे पानी की आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे खाड़ी देशों में पेयजल का संकट गहरा गया है। युद्ध के पहले 14 दिनों में ही 50 लाख टन से अधिक कार्बन उत्सर्जन हुआ है, जो लगभग 11 लाख कारों के सालाना प्रदूषण के बराबर है। यह प्रदूषित मलबा और भारी धातुएं मिट्टी और जल स्रोतों को दशकों तक दूषित रखने की क्षमता रखते हैं।
ईरान संघर्ष का असर अब दक्षिण एशिया के मौसम चक्र पर भी दिखने लगा है। हाल के दिनों में उत्तर भारत और दिल्ली-एनसीआर में हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि के पीछे युद्ध जनित वायुमंडलीय बदलावों को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। राज्यसभा में भी इस जहरीले धुएं के भारत तक पहुंचने का मुद्दा उठाया गया है, जिससे गुजरात, राजस्थान और पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्यों में वायु गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है। हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत और ईरान के बीच की भौगोलिक दूरी और विशाल हिमालय पर्वत श्रृंखला एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर रही है, जो सीधे तौर पर जहरीले बादलों को भारतीय भूभाग में प्रवेश करने से रोकती है। फिर भी, यदि जेट स्ट्रीम (तेज हवाएं) मजबूत होती हैं, तो बारीक कालिख के कण भारतीय वायुमंडल को प्रदूषित कर सकते हैं।

