ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026 की संवैधानिक वैधता को अब केवल अदालत में दी जा सकती है चुनौती, विशेषज्ञों ने कानूनी विकल्पों और सरकारी प्रक्रिया पर दी अपनी राय

नई दिल्ली | ट्रांसजेंडर (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 के लागू होने के बाद कानूनी विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि अब इस कानून को वापस लेने या बदलने का एकमात्र रास्ता न्यायपालिका है। विशेषज्ञों के अनुसार, चूंकि यह बिल अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बन चुका है, इसलिए इसकी संवैधानिक वैधता को केवल सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है। यह बयान तब आया है जब कई ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता और विपक्षी दल इस एक्ट को “पीछे ले जाने वाला और गैर-संवैधानिक” बताकर विरोध कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं का मुख्य आरोप है कि सरकार ने ‘सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन’ (स्व-पहचान) के अधिकार को सीमित करने से पहले संबंधित हितधारकों से उचित परामर्श नहीं किया।

लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने स्पष्ट किया है कि किसी भी बिल को संसद में पेश करने से पहले हितधारकों से सलाह लेना सरकार के लिए कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है। दूसरी ओर, केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री बीएल वर्मा ने राज्यसभा में बताया कि ‘स्व-पहचान’ के प्रावधान में बदलाव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अधिनियम का लाभ वास्तविक और गंभीर सामाजिक बहिष्कार झेल रहे लाभार्थियों तक ही पहुंचे। सरकार का दावा है कि परिभाषा को सटीक बनाने से नियमों का कार्यान्वयन अधिक प्रभावी होगा। हालांकि, सरकार ने यह स्वीकार किया कि बिल पेश करने से पहले कोई सार्वजनिक ड्राफ्ट प्रकाशित नहीं किया गया था, जिसे विपक्ष ने प्रक्रियात्मक खामी बताया है।

ट्रांसजेंडर समुदाय में इस कानून को लेकर गहरा असंतोष है, जिसके विरोध में कल्कि सुब्रमण्यम जैसे प्रतिनिधियों ने ‘राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद’ (NCTP) से इस्तीफा दे दिया है। एडवोकेट विवेक गर्ग जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी कानून के प्रभाव को समझने के लिए कम से कम एक-दो साल का समय देना चाहिए, लेकिन अधिकार कार्यकर्ता इसे तत्काल प्रभाव से कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 4.87 लाख ट्रांसजेंडर व्यक्ति हैं, जिनके अधिकारों को परिभाषित करने वाले 2019 के मूल अधिनियम की जगह अब इस नए 2026 के संशोधन ने ले ली है। अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है।

Next Post

कमर्शियल गैस की किल्लत और आसमान छूती कीमतों से देश का फूड सेक्टर बेहाल, रेस्टोरेंट्स ने घटाया स्टाफ और मेन्यू से गायब हुईं पकाने में समय लेने वाली डिशेज

Fri Apr 3 , 2026
नई दिल्ली | पश्चिम एशिया में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते भू-राजनैतिक तनाव का सीधा असर अब भारत की रसोई और फूड इंडस्ट्री पर दिखने लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाली सप्लाई चेन बाधित होने के कारण भारत में कमर्शियल एलपीजी की भारी किल्लत हो […]

You May Like