जबलपुर: मप्र हाईकोर्ट ने एक मामले में अहम कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए कहा कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी अपने अधिकार कर्तव्य के निर्वहन के दौरान कोई कार्य करता है, तो उसके विरुद्ध मुकदमा चलाने के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है। हाईकोर्ट जस्टिस बी पी शर्मा की एकलपीठ ने उक्त मत के साथ हाईकोर्ट ने पश्चिम मध्य रेल जबलपुर में पदस्थ चीफ विजिलेंस इंस्पेक्टर, विजिलेंस इंस्पेक्टर और असिस्टेंट विजिलेंस ऑफीसर के खिलाफ लंबित आपराधिक प्रकरण व कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
यह मामला वर्ष 2011 का है, जब रेलवे के सतर्कता निरीक्षकों ने एक ट्रेन में टिकट निरीक्षक प्यार सिंह मीणा के कार्य की जांच की थी। इसके बाद प्यार सिंह मीणा ने आरोप लगाया था कि उसके साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की गई। इस संबंध में जीआरपी कटनी में भादवि की धारा 294, 323, 506 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया था।जबलपुर निवासी विजिलेंस अधिकारी सुनील कुमार मिश्रा व दो अन्य ने उक्त एफआईआर को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अजय रायजादा, अंजना श्रीवास्तव व अमित रायजादा ने पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि पूर्व में जीआरपी थाना जबलपुर एवं पुलिस अधीक्षक रेल द्वारा की गई जांच में इन अधिकारियों को निर्दाेष पाया था और केवल एक अन्य अधिकारी सुभाष यादव को दोषी माना गया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाए कि घटना कटनी-जबलपुर की थी, लेकिन शिकायत तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक रीवा गाजीराम मीणा के हस्तक्षेप पर कटनी में दर्ज की गई थी। जबकि आईजी का जीआरपी थाना पर कोई क्षेत्राधिकार नहीं था।
