पुश्तैनी झूला-चकरी से गुजर-बसर, मेहनत ज्यादा कमाई कम

जावरा। दो वक्त की रोटी के लिए दूर-दूर तक भटकना हमारी मजबूरी है। कडी मेहनत के बावजूद परिवार का गुजारा मुश्किल से होता है। पर करें भी तो क्या, यही हमारा पुश्तैनी धंधा है। इस काम को हम लोग पीडी दर पीडी करते आ रहे हैं। यह बातें चेहरे पर मायूसी लिए झूला-चकरी वालों ने मंगलवार को यहां ईदगाह के सामने इस संवाददाता को बताई। बच्चों के मनोरंजन हेतु ईदगाह परिसर में झूले-चकरी लगा रहे आजम पिता दिलदार खां और शकील पिता पिल्लू खां से रूबरू हो उनके काम-धंधे को गहराई से समझने की कोशिश की गई तो उन्होंने बताया कि उनके पास खेती-बाडी नहीं होने से रोजी-रोटी के चक्कर में मेले-ठेले में झूला-चकरी लगाकर कमाने जाना पडता है। यही हमारे रोजगार का मुख्य साधन है। हमारे पूर्वज यही काम करते-करते मर खप गए। यही वजह है कि हम भी उनका अनुसरण करते हुए मेले में झूला-चकरी व नाव लगा बच्चों का मनोरंजन करते हैं। इसी से हमारे घर-परिवार की आजीविका चलती है। हालांकि काफी मशक्कत के बाद भी इतनी कमाई नहीं हो पाती। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि यहां ( ईदगाह ) तीन से चार घंटे का धंधा रहेगा। लेकिन हम लोग दो दिन पहले से झूले, चकरी खडे करने में जुटे हुए हैं।

इनका कहना है कि आसपास के ग्रामीण अंचलों में थोडे-थोडे दिनों के अंतराल से आयोजित होने वाले मेलों के कारण उनको ज्यादा परेशानी नहीं होती है। पिपलौदा के समीप निनोर कस्बे से मेला निपटा कर यहां पहुंचे झूला-चकरी संचालकों ने बताया कि कुछ दिन बाद पास के गांव भीमाखेडी में हनुमान जयंती पर मेले का आयोजन होना है तो हम लोग वहां चले जायेंगे। राजस्थान के अजमेर जिले थाटुटी गांव के रहने वाले इन लोगों के मुताबिक ईदगाह परिसर में चार चकरियाँ, एक झूला, चार सीट का व एक लोहे की नाव बच्चों के मनोरंजन हेतु लगाई गई है। वैसे ये लोग गांव, कस्बों के अलावा इंदौर, भोपाल जैसे शहरों में भी यही काम कर चुके हैं।

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