
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल व जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की युगलपीठ ने अनुपातहीन संपत्ति के एक मामले में आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की कार्यप्रणाली पर हैरान जताई है। न्यायालय ने पूछा कि जब याचिकाकर्ता का जन्म 1996 में हुआ और उसे नौकरी 2023 में मिली, तो फिर 1997 से 2021 तक की संपत्ति की जांच किस आधार पर की जा रही है। न्यायालय ने ईओडब्ल्यू के डीजी और उनके विधिक सलाहकार से इस संबंध में सात दिन के अंदर जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं।
दरअसल याचिकाकर्ता छतरपुर निवासी कृष्ण प्रताप सिंह चंदेल की ओर से दलील दी गई कि उसका जन्म 1996 में हुआ और उसे सरकारी नौकरी 2023 में मिली। इसके बावजूद ईओडब्ल्यू ने एक अप्रैल 1997 से 31 मार्च 2021 तक की अवधि को चेक पीरियड बताते हुए उसकी संपत्ति की जांच शुरू कर दी। इस अवधि में वे नाबालिग थे और किसी भी सरकारी सेवा में नहीं थे। जिस पर इस अवधि की संपत्ति को आय से अधिक कैसे माना जा सकता है। मूल एफआईआर याचिकाकर्ता के भाई के विरुद्घ दर्ज हुई थी। भाई समिति प्रबंधक के पद पर कार्यरत थे। उन पर आय से अधिक संपत्ति का आरोप लगा। बाद में परिवार के अन्य सदस्यों के साथ याचिकाकर्ता का नाम भी जोड़ दिया गया। इसी आधार पर याचिकाकर्ता को नौकरी से हटा दिया गया। सुनवाई पश्चात् न्यायालय ने अनावेदकों से जवाब तलब किया है।
