रेलवे की नीति के तहत पोते को अधिग्रहीत भूमि के बदले नियुक्ति का अधिकार नहीं

जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि रेलवे की नीति के तहत पोते को रेलवे द्वारा अधिग्रहित भूमि के बदले नियुक्ति का अधिकार नहीं है। जस्टिस विवेक रूसिया व जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें रेलवे को सीधी के युवक को जमीन के बदले नौकरी देने कहा गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि कैट ने उक्त आदेश देने में गलती की है।

दरअसल, सीधी निवासी भैया प्रशांत सिंह ने कैट में याचिका दायर कर कहा था कि रेलवे ने रीवा-सीधी रेलवे लाइन प्रोजेक्ट के लिए उसके दादा की कुछ जमीन अधिगृहीत की थी। इसका मुआवजा भी दिया गया। प्रशांत ने जमीन के बदले नौकरी के लिए आवेदन किया, जिसे रेलवे ने निरस्त कर दिया। कैट ने रेलवे को आदेश दिया था कि प्रशांत को नौकरी देने पर पुनर्विचार करें। कैट के इस आदेश को केन्द्र सरकार और पश्चिम मध्य रेलवे ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। रेलवे की ओर से अधिवक्ता अर्णव तिवारी ने दलील दी क नियम में यह प्रावधान है कि मुआवजे के अतिरिक्त रोजगार केवल भूमि के एकमात्र स्वामी या उसके पुत्र, पुत्री, पति या पत्नी को ही दिया जा सकता है। चूंकि प्रशांत मूल भूस्वामी का पोता था, इसलिए वह उक्त प्रावधानों के अंतर्गत पात्र आश्रितों की श्रेणी में नहीं आता। सुनवाई पश्चात् न्यायालय ने उक्त निर्देश दिये।

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