प. आशियाई में छिडे हुए युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा संकट की स्थिति बढ़ती जा रही है। इधर भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग ने देश को नए आपूर्ति संसाधनो पर विचार करने के लिए बाधित किया है। देश की कुल ऊर्जा सब्सिडी रिकॉर्ड स्तर पर है। हाल के वर्षों में, भारत ने खुद को एक अंतरराष्ट्रीय जलवायु नेता के रूप में स्थापित किया है, 2030 तक वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना बढ़ाने का सरकार का प्रयास है। लेकिन पेट्रोल—डिझल और नेचुरल गैस के क्षेत्र में नए अवसर पैदा करना सरकार की मजबुरी बनती जा रही है।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को अलग करने और शुद्ध-शून्य लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए डी—कार्बोनाइजेशन उपायों को वित्त पोषित किया जा रहा है। कुल ऊर्जा सब्सिडी में स्वच्छ ऊर्जा सब्सिडी का हिस्सा दस प्रतिशत से कम था, जबकि कोयला, तेल और गैस सब्सिडी का योगदान इससे कई जादा था। शेष सब्सिडी में से अधिकांश बिजली की खपत के लिए थी, खास कर कृषि क्षेत्र में। ऊर्जा की बढ़ती मांग के कारण भारत को कई उपाय करने के लिए प्रेरित किया है। जिसमें जीवाश्म ईंधन का उत्पादन बढ़ाने का प्रयास भी शामिल है।
गरीब परिवारों की रक्षा करने हेतु केंद्र सरकार ने पेट्रोल, डीजल और घरेलू तरलीकृत गैस की खुदरा कीमतों को सीमित किया था। लेकिन हाल ही मे प. आशियाई संकट के बाद गैस दरों मे बढ़ोतरी की गई थी। व्यवसायों और उपभोक्ताओं को प्रत्यक्ष बजटीय हस्तांतरण प्रदान करना और मौजूदा ऊर्जा आपूर्ति का समर्थन करना सरकार की प्राथमिकता है। औद्योगिक जरूरतों के कारण कोयले की खपत और सब्सिडी बढ़ती जा रही है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार देश के कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति में कोयले का योगदान 45 प्रतिशत से ज्यादा है, जो 2020 में 43% था। जीवाश्म ईंधन सब्सिडी स्वच्छ ऊर्जा सब्सिडी की तुलना में पाँच गुना अधिक थी।
देश को अगले साल तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए प्रेरित करने का मतलब है कि सरकार सभी प्रकार की ऊर्जा आपूर्ति में निवेश करना जरूरी है। भू-राजनीतिक अस्थिरता देश को जीवाश्म ईंधन पर निर्भर रहने के लिए मजबूर कर रही है इसमें कोई दो राय नही है। स्वच्छ ऊर्जा समाधान स्थायी आर्थिक विकास प्रदान कर सकते हैं और प्रदूषण को खत्म करने और आवश्यक जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए एक व्यावहारिक दृष्टि के साथ एक एजेंडा-सेटिंग देश के रूप में भारत के वैश्विक जलवायु नेतृत्व को बहाल कर सकते हैं।
केंद्र सरकार अपनी उभरती न्यायसंगत संक्रमण आवश्यकताओं का समर्थन करने के लिए अपने जीवाश्म ईंधन कर राजस्व के एक हिस्से को निर्धारित करने पर विचार कर सकती है। भारत को अपने ऊर्जा परिवर्तन को न्यायपूर्ण, टिकाऊ और समावेशी बनाने के लिए महत्वपूर्ण निवेश की आवश्यकता होगी राज्यों के स्वामित्व वाले उद्यम इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे। उनके बहुसंख्यक शेयरधारक के रूप में, सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन संस्थाओं को जाने वाली सभी नई पूंजी भारत की शुद्ध शून्य प्रतिबद्धताओं से जुड़ी हो।
– श्रीराम जोशी
