नई दिल्ली | भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सोमवार का दिन भारी उथल-पुथल भरा रहा, जब अमेरिकी डॉलर के सामने रुपया (INR) पस्त होकर 92.52 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, इस ऐतिहासिक गिरावट का मुख्य कारण मध्य पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने का खतरा पैदा हो गया है। इसके चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 25 प्रतिशत की भारी तेजी आई और यह 116 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। चूंकि भारत अपनी ईंधन जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, इसलिए डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव चरम पर पहुंच गया है।
करेंसी एक्सपर्ट्स का कहना है कि रुपया शुक्रवार की तुलना में 46 पैसे के बड़े ‘गैप’ के साथ खुला, जो बाजार में व्याप्त अनिश्चितता को दर्शाता है। एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर. के अनुसार, रुपये का चार्ट फिलहाल काफी कमजोर नजर आ रहा है और यदि यह 92.30 के स्तर के ऊपर टिका रहता है, तो आने वाले दिनों में और भी बड़ी गिरावट की संभावना है। तेल आयातकों और बड़ी कंपनियों द्वारा कच्चे तेल के भुगतान के लिए भारी मात्रा में डॉलर की खरीदारी करने से घरेलू मुद्रा के लिए स्थितियां और भी चुनौतीपूर्ण हो गई हैं, जिससे आम जनता पर महंगाई की मार पड़ने का खतरा बढ़ गया है।
रुपये की इस बेतहाशा गिरावट को रोकने के लिए अब सबकी नजरें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर टिकी हैं। बाजार को उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक इस अत्यधिक अस्थिरता को थामने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर हस्तक्षेप कर सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ इसे केवल एक ‘स्पीड ब्रेकर’ मान रहे हैं, क्योंकि वैश्विक तनाव कम होने तक रुपये को वास्तविक मजबूती मिलना मुश्किल लग रहा है। फिलहाल 91.90-92.00 का स्तर रुपये के लिए एक महत्वपूर्ण सपोर्ट माना जा रहा है। आरबीआई की सक्रियता ही अब तय करेगी कि रुपया 93 के मनोवैज्ञानिक स्तर को छूने से बच पाता है या नहीं।

