क्या अरुणाचल प्रदेश बन रहा है दुनिया का दूसरा ‘बरमूडा ट्रायंगल’? सुखोई हादसे के बाद एक्सपर्ट्स ने पूर्वोत्तर के जानलेवा मौसम और हवाई खतरों पर जताई गहरी चिंता

तेजपुर | असम के कार्बी आंगलोंग में भारतीय वायु सेना के Su-30 MKI फाइटर जेट के हालिया क्रैश ने उत्तर-पूर्वी भारत के हवाई मार्ग की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस दर्दनाक हादसे में दो पायलटों की जान जाने के बाद रक्षा विशेषज्ञों ने अरुणाचल प्रदेश और आसपास के पहाड़ी इलाकों को “एविएशन का बरमूडा ट्रायंगल” करार दिया है। पूर्व ग्रुप कैप्टन मोहंतो पंगिन पाओ के अनुसार, पूर्वी हिमालय का यह दुर्गम क्षेत्र अपने अप्रत्याशित मौसम, खड़ी पहाड़ियों और घने जंगलों के कारण पायलटों के लिए काल साबित हो रहा है, जहाँ साफ आसमान चंद मिनटों में जानलेवा बादलों में बदल जाता है।

विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि दिल्ली जैसे निर्णय लेने वाले केंद्रों से दूर होने के कारण पूर्वोत्तर के इन संवेदनशील इलाकों की हवाई सुरक्षा चुनौतियों को अक्सर ‘नजर से ओझल’ कर दिया जाता है। सुखोई के पूर्व पायलटों ने खुलासा किया है कि इस क्षेत्र में उड़ने वाले कई विमानों में ‘इमरजेंसी लोकेटर ट्रांसमीटर’ (ELT) या तो अनुपस्थित हैं या खराब स्थिति में हैं। इसके अभाव में घने जंगलों और गहरी घाटियों में क्रैश हुए मलबे को ढूंढने में बचाव दल को कई दिन लग जाते हैं, जिससे जीवन बचाने की संभावनाएं कम हो जाती हैं। हालिया सुखोई हादसे ने इस तकनीकी खामी को फिर से उजागर किया है।

पिछले एक दशक में अरुणाचल प्रदेश और असम में हुए विमान व हेलीकॉप्टर हादसों में अब तक 60 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री दोरजी खांडू की मौत जैसा बड़ा हादसा भी शामिल है। लगातार हो रही इन दुर्घटनाओं को देखते हुए पूर्व ग्रुप कैप्टन पाओ ने पूरे नॉर्थईस्ट में एक बड़े ‘एविएशन सेफ्टी ऑडिट’ की मांग की है। उन्होंने जोर दिया है कि एयरपोर्ट और हेलीपैड पर क्रैश-फायर टेंडर, एम्बुलेंस और प्रशिक्षित बचाव दल जैसी आपातकालीन सुविधाओं की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि भविष्य में हमारे वीर योद्धाओं और नागरिकों को इन “रहस्यमयी” भौगोलिक खतरों से बचाया जा सके।

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