शोक की वो घड़ी, जो बन गई परंपरा; यहां 100 साल से नहीं खेली गई होली

बैतूल। मुलताई क्षेत्र स्थित डहुआ गांव में पिछले लगभग 100 वर्षों से होली नहीं खेली जाती। यहां होली का दिन सामान्य दिनों की तरह शांत वातावरण में गुजरता है।

करीब 2100 की आबादी वाले इस गांव में न रंग-गुलाल उड़ता है, न ढोल बजते हैं और न ही उत्सव जैसा माहौल दिखाई देता है। गांव के बच्चे भी जानते हैं कि होली के दिन रंग खेलना परंपरा के विरुद्ध माना जाता है। इस परंपरा का पालन गांव का प्रत्येक परिवार करता है।

ग्रामीणों के अनुसार लगभग एक सदी पूर्व होली के दिन गांव के तत्कालीन प्रधान नड़भया मगरदे की कुएं में डूबने से मृत्यु हो गई थी। उस समय गांव के लोग परंपरा के अनुसार एक कुएं के पास रंग खेलते और बाद में उसी कुएं में स्नान करते थे। बताया जाता है कि प्रधान कुएं में कूदे, लेकिन बाहर नहीं निकल सके। बाद में उनका शव कुएं से निकाला गया। इस घटना से गांव में गहरा शोक छा गया।

इसके बाद गांव के बुजुर्गों ने निर्णय लिया कि जिस दिन यह अनहोनी हुई, उस दिन भविष्य में होली नहीं मनाई जाएगी। तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष अशोक कड़वे ने बताया कि उन्होंने अपने जीवन में गांव में कभी होली खेलते नहीं देखी। ग्रामीण गीता कड़वे के अनुसार विवाह के बाद जब वे गांव आईं तो यह परंपरा उन्हें आश्चर्यजनक लगी, लेकिन समय के साथ उन्होंने भी इसे स्वीकार कर लिया।

ग्रामीणों के अनुसार कुछ वर्ष पूर्व युवाओं ने होली मनाने का प्रयास किया था, लेकिन उसी दिन मगरदे परिवार में शोक की घटना हो गई। इसके बाद लोगों का विश्वास और मजबूत हो गया और परंपरा यथावत बनी रही।

डहुआ गांव में केवल होली के दिन ही नहीं, बल्कि उसके बाद पांच दिनों तक भी कोई उत्सव नहीं मनाया जाता। पंचमी के दिन ग्रामीण एक-दूसरे के घर जाकर पारंपरिक रूप से त्योहार मनाते हैं।

उल्लेखनीय है कि बैतूल जिले के अन्य गांवों में भी होली से जुड़ी अलग-अलग परंपराएं प्रचलित हैं। घोड़ाडोंगरी तहसील के बरेलीपार गांव में होली दो दिन पूर्व मनाई जाती है, जबकि शाहपुर तहसील के रायपुर गांव में एक दिन बाद उत्सव मनाने की परंपरा है।

डहुआ गांव की यह परंपरा एक दुखद घटना की स्मृति और उससे जुड़ी आस्था का प्रतीक बन चुकी है। ग्रामीणों का मानना है कि परंपरा का पालन ही गांव की शांति और सुख-समृद्धि के लिए आवश्यक है।

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