इस्लामाबाद | अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच रिश्तों की कड़वाहट अब सार्वजनिक मंचों पर दिखने लगी है। अमेरिकी कांग्रेस के विशेष सत्र में ट्रंप ने दावा किया कि उनके हस्तक्षेप के बिना भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध छिड़ सकता था। ट्रंप ने अपनी उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि उन्होंने पिछले दस महीनों में आठ संभावित युद्ध रुकवाए हैं। सबसे चौंकाने वाला बयान तब आया जब उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका बीच में न आता, तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की जान को गंभीर खतरा हो सकता था। इस बयान ने इस्लामाबाद को कूटनीतिक रूप से रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है।
ट्रंप की इस टिप्पणी ने न केवल शहबाज शरीफ के नेतृत्व बल्कि पाकिस्तानी सेना की साख पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान द्वारा अमेरिका से मदद की अपील करना अब उसके लिए गले की हड्डी बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि किसी देश के प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस देश की आंतरिक कमजोरी को दर्शाती है। हालांकि अप्रैल में ट्रंप ने शहबाज को “अच्छा आदमी” बताया था, लेकिन अब उनके बदले हुए सुरों ने पाकिस्तान की सैन्य और राजनीतिक संप्रभुता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
पाकिस्तान अब इस स्थिति में है जहां वह न तो अमेरिका से पूरी तरह दूरी बना सकता है और न ही ट्रंप के इन अपमानजनक बयानों को सहजता से स्वीकार कर पा रहा है। गाजा बोर्ड ऑफ पीस की बैठक में भी शहबाज शरीफ ने अमेरिका के साथ सहयोग की बात दोहराई थी, लेकिन ट्रंप के हालिया बयानों ने दोनों देशों के समीकरणों को बिगाड़ दिया है। पाकिस्तानी सेना और सरकार दोनों के लिए यह बयान एक बड़ी किरकिरी साबित हो रहा है, क्योंकि इससे यह संदेश जा रहा है कि पाकिस्तान की सुरक्षा पूरी तरह से वाशिंगटन की दया पर टिकी हुई है।

