सेना की थाली में स्थानीय खेतों की ताकत

रायसेन से आई यह खबर केवल एक सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि भारत की कृषि और रक्षा व्यवस्था के बीच एक नई साझेदारी की शुरुआत है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा यह ऐलान कि अब सैन्य छावनियों में स्थानीय किसानों से सीधे जैविक सब्जियां और फल खरीदे जाएंगे, और सेना की कैंटीनों में ज्वार, बाजरा, रागी जैसे श्रीअन्न को अनिवार्य किया जाएगा,दरअसल ‘आत्मनिर्भर भारत’ के एक व्यावहारिक मॉडल की झलक है.

अब तक सैन्य छावनियों में खाद्य आपूर्ति का बड़ा हिस्सा लंबी सप्लाई चेन के जरिए आता रहा है, जिसमें ताजगी, गुणवत्ता और लागत,तीनों पर सवाल खड़े होते रहे हैं. ऐसे में स्थानीय स्तर पर सीधे किसानों से खरीद की यह पहल न केवल जवानों को ताजा और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराएगी, बल्कि सप्लाई चेन को छोटा और अधिक पारदर्शी भी बनाएगी. इससे भ्रष्टाचार और बिचौलियों की भूमिका भी सीमित होगी, जो लंबे समय से कृषि क्षेत्र की एक बड़ी समस्या रही है.

दूसरी ओर, यह निर्णय किसानों के लिए भी एक स्थिर और भरोसेमंद बाजार तैयार करता है. अक्सर किसान अपनी उपज के उचित दाम के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन यदि सेना जैसी बड़ी संस्था सीधे खरीद करेगी, तो यह एक ‘गारंटीड डिमांड’ का मॉडल बन सकता है. खासतौर पर मध्यप्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में, जहां छोटे और मध्यम किसान बड़ी संख्या में हैं, यह योजना आय बढ़ाने में निर्णायक साबित हो सकती है.

श्रीअन्न (मिलेट्स) को सेना के आहार में अनिवार्य करना भी एक दूरदर्शी कदम है. ज्वार, बाजरा और रागी जैसे अनाज न केवल पोषण से भरपूर हैं, बल्कि जलवायु के अनुकूल भी हैं. कम पानी में उगने वाले ये फसलें किसानों के लिए जोखिम कम करती हैं और पर्यावरण के लिहाज से भी टिकाऊ हैं. संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2023 को ‘अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष’ घोषित किए जाने के बाद भारत लगातार इनके प्रचार-प्रसार पर जोर दे रहा है, और अब सेना में इनका उपयोग इस अभियान को और गति देगा.

हालांकि, इस पहल के सफल क्रियान्वयन के लिए कुछ चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सबसे पहले, स्थानीय स्तर पर पर्याप्त मात्रा और गुणवत्ता सुनिश्चित करना होगा. सेना की जरूरतें बहुत बड़ी और नियमित होती हैं, ऐसे में किसानों को संगठित करना, उन्हें प्रशिक्षण देना और एक मजबूत लॉजिस्टिक सिस्टम तैयार करना आवश्यक होगा. इसके अलावा, जैविक उत्पादों की प्रमाणिकता और गुणवत्ता नियंत्रण भी एक अहम पहलू रहेगा.

रायसेन में आयोजित उन्नत कृषि महोत्सव इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत है, जहां किसानों को आधुनिक तकनीक, ड्रोन और उन्नत पशुपालन की जानकारी दी जा रही है. यदि इस तरह के प्रयासों को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो यह योजना केवल एक सरकारी घोषणा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एक व्यापक कृषि-सुधार आंदोलन का रूप ले सकती है.कुल मिलाकर यह पहल ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे को वास्तविक अर्थों में साकार करने की दिशा में एक ठोस कदम है. जब देश की सुरक्षा और अन्नदाता एक-दूसरे के साथ सीधे जुड़ेंगे, तब न केवल अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि एक आत्मनिर्भर और सशक्त भारत की नींव भी और मजबूत होगी.

 

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