ईरान एक बार फिर वैश्विक राजनीतिक मानचित्र के केंद्र में आ खड़ा हुआ है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का जी-7 शिखर सम्मेलन से अचानक प्रस्थान करना और उसके साथ ही ईरान को लेकर बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियाँ, इस बात की ओर संकेत करती हैं कि विश्व व्यवस्था में एक नया भूचाल आने की आशंका बन रही है. ईरान के भीतर सत्ता परिवर्तन को लेकर गंभीर अटकलें चल रही हैं. विशेष रूप से अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके उत्तराधिकारी माने जा रहे पुत्र मुजतबा खामेनेई के इर्द-गिर्द चल रही गतिविधियाँ, इस रहस्य को और भी गहरा बना रही हैं.
1979 की इस्लामिक क्रांति ईरान के इतिहास का निर्णायक मोड़ थी. शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की पश्चिम समर्थित और अपेक्षाकृत उदार सरकार को अपदस्थ कर एक धर्मतांत्रिक शासन की स्थापना की गई. यह क्रांति केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक क्रांति भी थी, जिसने ईरानी समाज को कट्टरपंथी इस्लामी ढांचे में ढाल दिया.
आज, 45 वर्ष बाद, यही धार्मिक तंत्र अंतरराष्ट्रीय दबाव, आंतरिक असंतोष और एक बदलती हुई युवा पीढ़ी की अपेक्षाओं के बीच जूझ रहा है. उच्च बेरोजगारी, मुद्रा स्फीति, राजनीतिक सेंसरशिप, और महिलाओं के अधिकारों पर पाबंदियां,इन सबने इस्लामिक शासन के प्रति व्यापक असंतोष पैदा किया है.दरअसल, ऐसा लगता है कि वैश्विक समुदाय अब ईरान की प्रतिक्रिया क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगा है, खासकर सीरिया और लेबनान जैसे मोर्चों पर ईरान समर्थित गुटों की विफलताओं को देखते हुए. यह प्रश्न अब और अधिक प्रासंगिक हो गया है, क्या ईरान में तख्ता पलट संभव है? सैद्धांतिक रूप से, इस्लामिक गणराज्य में सत्ता परिवर्तन असाधारण और असंवैधानिक प्रक्रिया है, क्योंकि सर्वोच्च नेता का स्थान धार्मिक वैधता से तय होता है, लोकतांत्रिक मताधिकार से नहीं. लेकिन खामेनेई की उम्र (86 वर्ष), उनकी स्वास्थ्य समस्याएं, और उत्तराधिकारी को लेकर देश के भीतर ही फैली बेचैनी—इन सबने एक अस्थिर भविष्य की जमीन तैयार कर दी है.
यदि सत्ता परिवर्तन होता है, तो यह केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं होगा; यह वैचारिक और संस्थागत परिवर्तन की भी शुरुआत हो सकती है. मुजतबा खामेनेई यदि सत्ता में आते हैं, तो संभव है कि यह केवल परिवार की सत्ता स्थिर करने का प्रयास हो. लेकिन यदि जनता की आकांक्षाओं ने ज्यादा दबाव बनाया, तो एक नई क्रांति की भूमिका भी बन सकती है—शायद एक “सॉफ्ट रिवोल्यूशन” जो इस्लामिक गणराज्य को अधिक उदार और आधुनिक दिशा में मोडऩे का प्रयास करे.
ईरान में किसी भी तरह की अस्थिरता न केवल पश्चिम एशिया बल्कि संपूर्ण विश्व को प्रभावित कर सकती है. तेल आपूर्ति, शिया-सुन्नी संतुलन, यमन-सीरिया-लेबनान जैसे संघर्षों की दिशा, और इजऱाइल के प्रति खतरे की धार—सभी कुछ इस घटनाक्रम से सीधे जुड़े हैं. अमेरिका और इजऱाइल के लिए यह एक अवसर भी हो सकता है और खतरा भी. यदि वे परिवर्तन को नियंत्रित कर पाए, तो एक “नया ईरान” बन सकता है जो क्षेत्र में स्थिरता ला सके. लेकिन अगर स्थिति हाथ से निकल गई, तो एक और अफगानिस्तान या सीरिया जैसा अस्थिर देश बन सकता है. ईरान आज एक जटिल मोड़ पर खड़ा है—जहां धार्मिक अधिनायकवाद, जन असंतोष, वैश्विक दबाव और सामरिक महत्व एक साथ टकरा रहे हैं. यह कहना जल्दबाजी होगी कि तख्ता पलट तय है, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि अब “परिवर्तन” की भूमि तैयार हो चुकी है.कुल मिलाकर, देखना यह होगा कि यह परिवर्तन भीतर से आता है, या बाहर से थोपा जाता है. किसी भी स्थिति में, ईरान का भविष्य अब केवल तेहरान का विषय नहीं रहा, यह विश्व राजनीति की धुरी बन चुका है.
