संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80 वें सत्र में जलवायु परिवर्तन एक बार फिर केंद्र में रहा. इस बार बहस केवल कार्बन उत्सर्जन तक सीमित नहीं रही, बल्कि “जलवायु न्याय” और “वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं” पर भी गहराई से चर्चा हुई. यह वह मोड़ है जहां भारत ने न सिर्फ अपनी आवाज बुलंद की, बल्कि विकासशील देशों के साझा हितों को सामने रखने में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई. दुनिया जानती है कि जलवायु संकट का सबसे गहरा असर उन्हीं देशों पर पड़ रहा है जिनका उत्सर्जन ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम रहा है. आंकड़े बताते हैं कि औद्योगिक क्रांति से अब तक कुल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में अफ्रीका का योगदान केवल 4 प्रतिशत और भारत का लगभग 3.5 प्रतिशत है, जबकि विकसित देशों—विशेषकर अमेरिका और यूरोप—ने मिलकर 50 प्रतिशत से अधिक ग्रीनहाउस गैस छोड़ी हैं. बावजूद इसके, विकासशील देश ही सबसे गंभीर जलवायु आपदाओं का सामना कर रहे हैं. हालिया वर्षा-बाढ़ से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ्रीकी देशों को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ. भारत भी अपवाद नहीं—सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार 2022 में भारत में जलवायु-जनित आपदाओं से औसतन हर दिन 35 लोगों की मौत हुई और करीब 50 करोड़ डॉलर की आर्थिक क्षति हुई.
इसी संदर्भ में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में दोहराया कि जलवायु न्याय के बिना जलवायु कार्रवाई अधूरी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही ग्लासगो (सीओपी 26) में “पंचामृत” का एजेंडा पेश किया था, जिसमें 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य, 2030 तक 500 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता और कुल ऊर्जा जरूरत का 50 प्रतिशत नवीकरणीय स्रोतों से पूरा करने का संकल्प शामिल है. हाल ही में जारी भारत की ग्रीन एनर्जी प्रगति रिपोर्ट बताती है कि देश पहले ही 180 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के स्तर पर पहुंच चुका है, जो चीन के बाद दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा विस्तार है.
लेकिन सवाल केवल लक्ष्यों का नहीं, वित्त का भी है. विकासशील देशों का तर्क है कि “कॉमन बट डिफरेंशिएटेड रिस्पॉन्सिबिलिटी” यानी सभी देशों की साझा जिम्मेदारी अलग-अलग क्षमता और ऐतिहासिक बोझ के अनुसार तय होनी चाहिए. 2009 में विकसित देशों ने वादा किया था कि वे हर साल 100 अरब डॉलर जलवायु वित्त के लिए देंगे, लेकिन 2023 तक मुश्किल से 80 अरब डॉलर ही जुट पाए. भारत ने महासभा में यही प्रश्न उठाया—क्या गरीब देशों को केवल भाषणों से राहत मिलेगी या असल वित्तीय सहायता भी ?
यहां भारत की कूटनीति दोहरी धार पर चल रही है. एक ओर वह अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) और जी-20 में ग्रीन डेवेलपमेंट समझौते के माध्यम से वैश्विक दक्षिण को मंच प्रदान कर रहा है, वहीं दूसरी ओर विकसित देशों पर दबाव बना रहा है कि वे तकनीक हस्तांतरण और वित्तीय सहयोग सुनिश्चित करें. यही कारण है कि अफ्रीकी संघ से लेकर लातिन अमेरिकी देशों तक भारत की बात को गंभीरता से सुना जा रहा है.सच यह है कि जलवायु परिवर्तन आज केवल पर्यावरणीय मसला नहीं, बल्कि विकास, अर्थव्यवस्था और वैश्विक न्याय का प्रश्न है. यदि विकसित देश अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे हटते रहे तो दक्षिण के देशों में असंतोष बढ़ेगा और जलवायु सहयोग की पूरी प्रक्रिया खतरे में पड़ सकती है. भारत के लिए यह अवसर है कि वह “वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ” की अपनी पहल को और व्यापक बनाए और ठोस ग्रीन फंडिंग तंत्र के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाए.
अंतत:, जलवायु परिवर्तन की लड़ाई महज आंकड़ों या सम्मेलनों से नहीं जीती जाएगी. इसे जीतने के लिए जरूरी है कि दुनिया के सबसे कमजोर और सबसे अधिक प्रभावित समाजों को न्याय मिले. भारत इस दिशा में वैश्विक दक्षिण का स्वाभाविक नेता बनकर उभर रहा है. यही नेतृत्व 21वीं सदी में उसकी असली पहचान गढ़ेगा.
