इंदौर: शहर में इन दिनों रसोई गैस की किल्लत और बढ़ती कीमतों ने आम लोगों से लेकर होटल-रेस्टोरेंट व्यवसायियों तक को परेशानी में डाल दिया है. एक ओर प्रशासन द्वारा गैस आपूर्ति को लेकर सख्त नियम लागू किए गए हैं- जैसे 25 दिन बाद ही रिफिल की अनुमति- वहीं दूसरी ओर कमर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति पर रोक ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. नतीजतन, लोग अब ईंधन विकल्पों की ओर लौटने लगे हैं.
गैस एजेंसियों के बाहर लोगों की लंबी लाइनें आम हो गई हैं. उपभोक्ता घंटों खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन सीमित आपूर्ति के कारण सभी को समय पर सिलेंडर मिलना संभव नहीं हो पा रहा.होटल-रेस्टोरेंट का बदला सिस्टम कमर्शियल गैस की कमी से सबसे ज्यादा असर होटल और रेस्टोरेंट कारोबार पर पड़ा है. रेस्टोरेंट संचालक रोहित बताते हैं गैस खत्म होने के बाद हमें 2-3 दिन दुकान बंद रखनी पड़ी. अब मजबूरी में भट्टी खरीदकर कोयला और लकड़ी से समोसे-कचोरी बना रहे हैं. होटल संचालक मिथिलेश का कहना है कि गैस न होने से घर और होटल दोनों का काम प्रभावित हुआ. अब लकड़ी का इस्तेमाल कर रहे हैं, वरना व्यापार बंद हो जाता.
कोयला और लकड़ी के कारोबार में उछाल
गैस संकट ने कोयला और लकड़ी के व्यवसाय को अचानक बढ़ावा दे दिया है.50 साल से कोयला व्यवसाय कर रहे राजेंद्र सिंह खनूजा बताते हैं पहली बार कोयले की इतनी मांग देख रहे हैं. पहले गैस आसानी से मिलने से यह काम लगभग बंद हो गया था, लेकिन अब फिर से तेजी आ गई है.तेजिंदर सिंह खनूजा के अनुसार उनकी दुकान पर कई प्रकार के कोयले उपलब्ध हैं. इसमें लकड़ी का कोयला 40 रुपए प्रति किलो, हार्ड कोर 40 रुपए, नट कोयला 70 रुपए और नालीदार कोयला 15 रुपए प्रति किलो है. चाइना हार्ड कोयला महंगा लेकिन मांग में है. अब होटल-रेस्टोरेंट के साथ-साथ आम लोग भी थोड़ी मात्रा में कोयला खरीदकर घर में स्टॉक रखने लगे हैं.
वेस्ट लकड़ी की भी बढ़ी कीमत
लकड़ी का फर्नीचर बनाने वाले कारीगरों के पास भी अब ग्राहकों की संख्या बढ़ गई है. ईश्वर शर्मा और सुनील विश्वकर्मा बताते हैं पहले वेस्ट लकड़ी सस्ती में बेचते थे, लेकिन अब मांग बढ़ने से 5 से 10 रुपए प्रति किलो में भट्ठियों के लिए बेची जा रही है. स्टॉक भी तेजी से कम हो रहा है.
कंडे (उपले) भी बने सहारा
गैस संकट का असर इतना गहरा है कि अब लोग पारंपरिक ईंधन कंडे (उपले) की ओर भी लौट रहे हैं. विक्रेता शांति बाई कहती हैं पहले सिर्फ होली पर ही कंडे बिकते थे, लेकिन अब रोजाना लोग खरीद रहे हैं. गैस की किल्लत ने पुराने दिन याद दिला दिए. इंदौर के कई इलाकों में 10-15 दुकानों पर कंडे बिकते देखे जा रहे हैं.
प्रशासनिक नियमों पर उठ रहे सवाल
गैस रिफिल पर 25 दिन का नियम और कमर्शियल सिलेंडर की कमी ने व्यापारियों और आम जनता दोनों को मुश्किल में डाल दिया है. लोग प्रशासन से राहत की उम्मीद कर रहे हैं, ताकि रोजमर्रा की जिंदगी और व्यवसाय फिर से सामान्य हो सकें. इंदौर में गैस संकट ने न केवल लोगों की रसोई बल्कि पूरे व्यापारिक ढांचे को प्रभावित किया है. आधुनिक ईंधन से हटकर लोग फिर से पारंपरिक साधनों- कोयला, लकड़ी और कंडे—की ओर लौट रहे हैं. अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह बदलाव लंबे समय तक देखने को मिल सकता है.
