नई दिल्ली | ग्रीन एनर्जी सेक्टर की कंपनी क्लीन मैक्स एनवायरो एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड का ₹3,100 करोड़ का आईपीओ अपनी अत्यधिक महंगी वैल्यूएशन के कारण विवादों में घिर गया है। 400 के ‘प्राइस-टू-अर्निंग’ (P/E) रेशियो पर लाए गए इस इश्यू में 41 एंकर निवेशकों ने ₹921 करोड़ का निवेश किया है। बाजार विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि जहां फंड हाउस बाजार को महंगा बताकर मंदी की बात करते हैं, वहीं ₹1 फेस वैल्यू वाले शेयर को ₹1,053 (10 फेस वैल्यू पर ₹10,530) की भारी कीमत पर खरीद रहे हैं। पहले दिन सोमवार को रिटेल निवेशकों ने इससे दूरी बनाए रखी और मात्र 2 प्रतिशत ही आवेदन मिले।
क्लीन मैक्स की वित्तीय सेहत को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। वित्त वर्ष 2023 और 2024 में कंपनी को ₹97 करोड़ का घाटा हुआ था, जबकि 2025 में इसे महज ₹19 करोड़ का मामूली लाभ हुआ। आश्चर्य की बात यह है कि कंपनी पर ₹8,000 करोड़ से अधिक का भारी कर्ज है, लेकिन इस ₹3,100 करोड़ के आईपीओ में से मात्र ₹1,200 करोड़ ही कंपनी के पास जाएंगे। शेष ₹1,900 करोड़ ‘ऑफर फॉर सेल’ (OFS) के जरिए प्रमोटरों और पुराने निवेशकों की जेब में जाएंगे। विश्लेषकों का मानना है कि यह आईपीओ कंपनी की मजबूती के बजाय पुराने निवेशकों के एग्जिट के लिए लाया गया है।
एसबीआई लाइफ, टाटा इन्वेस्टमेंट और फ्रैंकलिन टेम्पलटन जैसे बड़े फंड हाउस द्वारा रिटेल निवेशकों की पूंजी को इतने महंगे वैल्यूएशन पर निवेश करने पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अतीत में पेटीएम, ओला और स्विगी जैसे महंगे आईपीओ में निवेशकों को भारी नुकसान झेलना पड़ा है, फिर भी फंड हाउसों द्वारा इस तरह का जोखिम उठाना ‘मजबूरी या स्वार्थ’ की ओर इशारा करता है। सेबी से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की जा रही है क्योंकि प्रमोटरों द्वारा अपनी हिस्सेदारी बेचना और भविष्य के काल्पनिक मुनाफे के आधार पर शेयर की कीमत तय करना छोटे निवेशकों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

