अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के बीच टैरिफ को लेकर छिड़ी कानूनी जंग ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को एक बार फिर अस्थिर कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से यह स्पष्ट कर दिया कि ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ के तहत व्यापक वैश्विक टैरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास नहीं, बल्कि कांग्रेस के पास है. यह फैसला केवल कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि अमेरिकी सत्ता-संतुलन की पुनर्पुष्टि है. किन्तु ट्रंप की प्रतिक्रिया ने यह संकेत दिया है कि उनके लिए संस्थागत मर्यादाएं अंतिम शब्द नहीं हैं. अदालत के निर्णय के कुछ ही घंटों के भीतर उन्होंने ‘ट्रेड एक्ट 1974’ की धारा 122 का सहारा लेकर 10 प्रतिशत का नया वैश्विक टैरिफ लागू किया और 24 घंटे के भीतर उसे बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया. यह त्वरित और आक्रामक निर्णय शैली बताती है कि ट्रंप नीति-निर्माण को स्थिर संस्थागत प्रक्रिया की बजाय राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम मानते हैं.यहीं से भारत सहित विश्व समुदाय के लिए वास्तविक चिंता शुरू होती है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार भरोसे और पूर्वानुमान पर टिका होता है. यदि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का राष्ट्रपति अदालत के निर्णयों के बाद भी वैकल्पिक कानूनी रास्ते खोजकर टैरिफ बढ़ा सकता है, तो किसी भी व्यापार समझौते की स्थायित्व पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है. ट्रंप का रिकॉर्ड बताता है कि वे पहले समझौता करते हैं और बाद में राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार उसे बदलने से नहीं हिचकते.
भारत के संदर्भ में स्थिति जटिल है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत या उससे अधिक ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ का खतरा मंडरा रहा था. वह संकट फिलहाल टल गया है. लेकिन 15 प्रतिशत का वैश्विक शुल्क भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है. वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद और आईटी-संबद्ध सेवाएं अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं. लागत बढऩे से प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होगी.
इस परिप्रेक्ष्य में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या ट्रंप विश्वसनीय साझेदार हैं. हालिया घटनाक्रम संकेत देता है कि उनकी प्राथमिकता घरेलू राजनीतिक संदेश है, न कि दीर्घकालिक वैश्विक प्रतिबद्धता. वे ‘अमेरिका फर्स्ट’ को किसी भी कीमत पर लागू करने के लिए कानूनी सीमाओं की परिधि तक जाने को तैयार हैं. आज 10 प्रतिशत, कल 15 प्रतिशत, और आवश्यकता पड़ी तो 150 दिनों के बाद नया रास्ता. ऐसी नीति-शैली में स्थायित्व की अपेक्षा करना कठिन है.
भारत को भावनात्मक या तात्कालिक राहत की मानसिकता से बाहर निकलना होगा. यदि 18 प्रतिशत के प्रस्तावित समझौते की तुलना में 15 प्रतिशत कम प्रतीत होता है, तो यह केवल गणितीय सांत्वना है. वास्तविक प्रश्न यह हैं कि छह महीने बाद क्या होगा.? क्या कांग्रेस मंजूरी देगी. क्या नया राजनीतिक दबाव पैदा होगा. ?क्या चुनावी मौसम में फिर टैरिफ हथियार बनेगा.?
इसलिए भारत को तीन स्तरों पर तैयारी करनी चाहिए. पहला, अमेरिका के साथ किसी भी व्यापार समझौते में स्पष्ट कानूनी सुरक्षा और विवाद निवारण तंत्र सुनिश्चित करना. दूसरा, निर्यात बाजारों का विविधीकरण तेज करना, विशेषकर यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में. तीसरा, घरेलू विनिर्माण और मांग को सुदृढ़ कर बाहरी झटकों के प्रति लचीलापन बढ़ाना.
ट्रंप की नीतियां बताती हैं कि वे अप्रत्याशित निर्णयों से राजनीतिक लाभ उठाने में विश्वास रखते हैं. ऐसे नेतृत्व के साथ संबंध रखते समय सतर्कता ही सर्वोत्तम कूटनीति है. भारत को यह मानकर चलना होगा कि परिस्थिति कभी भी बदल सकती है. इसलिए हर समझौते के साथ एक वैकल्पिक योजना तैयार रहनी चाहिए. वैश्विक व्यापार की इस उथल-पुथल में रणनीतिक धैर्य और दूर दृष्टि ही भारत की असली ताकत होगी.
