मुख्य आर्थिक सलाहकार ने “डिजिटल उपनिवेशवाद” के प्रति चेताया, सरकारों से एआई विनियमन की अपील

नयी दिल्ली, 18 फरवरी (वार्ता) केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने डिजिटल उपनिवेशवाद के प्रति सचेत करते हुए बुधवार को कहा कि सरकार को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग की शर्तें निर्धारित करनी चाहिये। श्री नागेश्वरन ने यहां दलित इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) के एक कार्यक्रम में कहा कि साल 2030 तक एआई के कारण वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 15.7 लाख करोड़ डॉलर की वृद्धि हो सकती है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका लाभ सबको समान रूप से मिले। उन्होंने कहा कि आज दुनिया में एआई में असमानता स्पष्ट है। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि दुनिया भर में नीति निर्माताओं ने जहां इंतजार और सीमित नियमन की नीति अपनायी हुई है, वहीं प्रौद्योगिकी के वास्तुकार समाज की संरचना तय कर रहे है। उन्होंने कहा, “प्रौद्योगिकी की नीति केवल तकनीकी विशेषज्ञों के हाथों में नहीं छोड़ी जा सकती। सरकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सिर्फ अधिकार ही नहीं दायित्व भी है कि वे एआई के उपयोग की शर्तों को निर्धारित करें।”

उन्होंने कहा कि कुछ गिने-चुने देश एआई पेटेंट, सुपरकंप्यूटिंग क्षमता और निजी निवेश पर प्रभुत्व रखते हैं। जिसे उभरता हुआ “एआई विभाजन” कहा जा रहा है, वह केवल तकनीकी क्षमता का नहीं , बल्कि मानव गरिमा का सवाल है। उन्होंने कहा कि अगले एक-डेढ़ साल में लिये गये निर्णय यह तय करेंगे कि एआई से कौन लाभान्वित होगा और इन प्रणालियों पर शासन कौन करेगा। भारत, अपने आकार, लोकतांत्रिक परंपरा और डिजिटल अवसंरचना के साथ इन मानकों को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वर्तमान परिस्थितियों को “डिजिटल उपनिवेशवाद” की संज्ञा देते हुए उन्होंने कहा कि पिछले तीन दशकों में रैम और स्टोरेज की लागत घटने से कंप्यूटिंग तक पहुंच में तेजी से इजाफा हुआ, लेकिन अब यह प्रवृत्ति उलट रही है। बड़ी कंपनियां प्रीमियम कीमत चुकाने में सक्षम हैं जिससे विशेष चिप्स, उच्च-प्रदर्शन वाले जीपीयू और उन्नत प्रोसेसिंग इकाइयों का इस्तेमाल अत्याधुनिक एआई मॉडलों के प्रशिक्षण के लिए हो रहा है और आम लोगों को इनका लाभ नहीं मिल पा रहा है। हार्डवेयर निर्माता उत्पादन बढ़ाने के प्रति अनिच्छुक दिख रहे हैं।

उन्होंने सवाल किया, “क्या हम ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जहां क्लाउड कंप्यूटिंग के माध्यम से कंप्यूटर तक पहुंच स्वामित्व का अधिकार नहीं बल्कि किराये की व्यवस्था बन जायेगी? यदि ऐसा है, तो पूंजी-विहीन देशों, संस्थानों और व्यक्तियों का क्या होगा? क्या हम डिजिटल उपनिवेशवाद के नये रूप को देखेंगे, जहां हार्डवेयर पर नियंत्रण रखने वाले ही हमारी अर्थव्यवस्था की “बौद्धिक परत” तक पहुंच नियंत्रित करेंगे?” श्री नागेश्वरन ने कहा कि तकनीकी प्रगति हमेशा समावेशी प्रगति की गारंटी नहीं देती। अमेरिका में 1980 और 90 के दशक में जैव-प्रौद्यौगिकी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आज एआई में भी यही पैटर्न दिखाई देता है – स्वामित्व वाले मॉडल, स्वामित्व डेटा, कंप्यूटर अवसंरचना का केंद्रीकरण, और अब ऊर्जा अवसंरचना में भी प्रवेश। यदि नीतिगत हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो परिणाम भी वैसे ही होंगे यानी सारा फायदा कंपनियों को होगा। उन्होंने कहा कि अभी एआई का तेज प्रसार मुफ्त या सब्सिडी वाली पहुंच के कारण संभव हो रहा है। लेकिन जब ये कंपनियां राजस्व मॉडल की तरफ बढ़ेंगी तब आम लोग तो दूर छोटे और मझौले उद्यम भी इससे वंचित रह जायेंगे। उन्होंने सवाल किया कि क्या एआई केवल प्रीमियम सदस्यता वहन करने वालों तक सीमित रह जाएगा।

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