ग्वालियर: ध्रुपद शैली भारतीय संगीत की जननी है। ख्याल, दादरा, ठुमरी, टप्पा आदि इसके बाद ही अस्तित्व में आए हैं। ग्वालियर का ध्रुपद से पुराना जुड़ाव रहा है। यह बात दिल्ली से आए पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर ने कही। वह राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय बैजू बावरा महोत्सव में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा: ध्रुपद गायन शैली का परंपरागत एवं वर्तमान स्वरूप ‘ विषय पर बतौर बतौर विषय विशेषज्ञ बोल रहे थे।
संगीत विश्वविद्यालय और प्रयास शिक्षा, साहित्य, कल व संगीत पीठ समिति के संयुक्त तत्वाधान में हुए महोत्सव के पहले दिन विद्वानों ने ध्रुपद शैली की बारीकियों से छात्र छात्राओं को परिचित कराया साथ ही संगीत की विधाओं का प्रदर्शन भी हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि ललित नारायण मिथिला मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा, बिहार से आई लावण्य कीर्ति सिंह रही।
कार्यक्रम में विद्वानों के रूप में नई दिल्ली से आए पं. मोहन श्याम शर्मा ने भी विषय पर अपने विचार रखे।
कुलगुरु प्रो स्मिता सहस्त्रबुद्धे की अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम में कुलसचिव अरुण सिंह चौहान, वित्त नियंत्रक डॉ आशुतोष खरे,विद्या परिषद के अशोक आनंद, प्रयास समित के कार्यकारी प्रो नीरज कुमार झा सहित शहर के कई गणमान्य नागरिक व छात्र छात्राएं मौजूद रहे। संचालन सांस्कृतिक समिति समन्वयक डॉ पारुल दीक्षित ने किया। डागर ने राग मुल्तानी में नोम तोम आलाप की अद्भुत प्रस्तुति दी। उनके साथ पं. मोहन श्याम शर्मा (नई दिल्ली) ने पखावज पर संगति की।
