
नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र के बीच राजनीतिक बहस अब केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की सदस्यता पर संभावित खतरे की चर्चा ने माहौल गरमा दिया है। लोकसभा में उनके हालिया भाषण और कथित टिप्पणी को लेकर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिए जाने के बाद यह मुद्दा राजनीतिक केंद्र बन गया है।
भाजपा नेताओं का आरोप है कि राहुल गांधी ने सदन की मर्यादा का उल्लंघन किया, जबकि कांग्रेस की ओर से इन आरोपों को निराधार बताया जा रहा है। प्रियंका गांधी ने भी गाली-गलौज के आरोपों को खारिज किया है। दूसरी ओर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू की आपत्ति और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की टिप्पणी ने विवाद को और तूल दे दिया है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नोटिस दिए जाने से सदस्यता स्वतः समाप्त नहीं होती, बल्कि यह एक लंबी संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा होता है। यदि लोकसभा अध्यक्ष नोटिस को स्वीकार करते हैं और मामला विशेषाधिकार समिति को भेजा जाता है, तभी आगे की जांच और सिफारिशों के आधार पर कार्रवाई संभव होती है।
संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत सांसदों को सदन में बोलने की स्वतंत्रता और कुछ विशेष अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन इन्हीं अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगने पर विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाया जाता है। समिति की रिपोर्ट के बाद फटकार, निलंबन जैसी कार्रवाई हो सकती है, जबकि सदस्यता समाप्ति अत्यंत दुर्लभ और गंभीर परिस्थिति में ही संभव मानी जाती है।
यानी फिलहाल राहुल गांधी की सदस्यता पर सीधा खतरा नहीं, लेकिन राजनीतिक और संसदीय दबाव ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय जरूर बना दिया है।
