सुप्रीम कोर्ट ने हिमंत सरमा के हेट स्पीच मामले में कहा, राजनीतिक लड़ाइयां अक्सर अदालत में लड़ी जाती हैं

नयी दिल्ली, 10 फरवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कथित हेट स्पीच मामले में याचिकाओं के ‘उल्लेख’ पर गौर करने के दौरान टिप्पणी की कि राजनीतिक लड़ाई विशेष रूप से चुनाव की अवधि के दौरान, अक्सर अदालतों में लड़ी जाती है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की जब असम के मुख्यमंत्री से जुड़े कथित हेट स्पीच और संबंधित सामग्री पर कार्रवाई की मांग करने वाली दो याचिकाओं का उल्लेख किया गया।

एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता निज़ाम पाशा ने दलील दी कि यह मामला एक राजनीतिक पदाधिकारी द्वारा दिए गए कथित घृणा भाषण से संबंधित है। उन्होंने एक वीडियो का हवाला दिया जिसमें मुख्यमंत्री कथित तौर पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए टिप्पणी कर रहे हैं।

इस दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “समस्या यह है कि जब चुनाव आते हैं, तो ऐसे मामले अक्सर यहाँ उच्चतम न्यायालय में ही लड़े जाते हैं। हम देखेंगे।”

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता एनी राजा की ओर से दायर ये याचिकाएं मुख्यमंत्री द्वारा 27 जनवरी को दिए गए एक सार्वजनिक भाषण और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की असम इकाई के एक्स हैंडल पर साझा किए गए एक वीडियो को चुनौती देती हैं।

वीडियो में श्री सरमा को दो मुस्लिम पुरुषों की एनिमेटेड छवियों की ओर बंदूक से गोली चलाते हुए दिखाया गया है, जिन्हें एक हथियार के क्रॉसहेयर (निशाने) के भीतर दिखाया गया है।

याचिकाओं के अनुसार, सार्वजनिक संबोधन के दौरान श्री सरमा ने कहा था कि ‘चार से पांच लाख मिया मतदाताओं’ को मतदाता सूची से हटा दिया जाएगा और ‘हिमंत बिस्वा सरमा और भाजपा सीधे तौर पर मियाओं के खिलाफ हैं।’ याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ‘मिया’ शब्द का इस्तेमाल मुसलमानों के संदर्भ में अपमानजनक तरीके से किया जाता है।

याचिकाओं में बताया गया है कि सात फरवरी को भाजपा की असम इकाई ने एक वीडियो साझा किया था जिसमें मुख्यमंत्री को दो मुस्लिम पुरुषों की एनिमेटेड छवि पर फायरिंग करते हुए दिखाया गया था, जिसके साथ ‘पॉइंट ब्लैंक शॉट’ और ‘नो मर्सी’ जैसे वाक्यांश लिखे थे। हालांकि आक्रोश के बाद आधिकारिक हैंडल से वीडियो हटा दिया गया था, लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह अन्य प्लेटफार्मों पर व्यापक रूप से प्रसारित हो रहा है।

माकपा ने तर्क दिया है कि ऐसी सामग्री अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ शत्रुता, बहिष्कार और डराने-धमकाने के माहौल को बढ़ावा देती है। याचिकाओं में कहा गया है कि संवैधानिक योजना मंत्रियों पर राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक भाईचारे को बनाए रखने का कर्तव्य डालती है। सांप्रदायिक घृणा को बढ़ावा देने वाला कोई भी आचरण मंत्री पद के अधिकार की सीमाओं से बाहर है।

याचिकाओं में यह भी दावा किया गया है कि कथित आचरण भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं 196, 197, 299 और 353 के तहत आपराधिक कृत्य है। याचिकाकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और विशेष जांच दल द्वारा जांच की मांग की है।

माकपा की ओर से यह याचिका अधिवक्ता लज़ाफ़ीर अहमद के माध्यम से दायर की गई थी। इससे पहले जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी इसी भाषण को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।

 

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