कर्मबोध से कर्मक्षय की ओर बढ़ो तभी जीवन का उत्कर्ष: मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

जबलपुर। ‘मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी विचित्रता यही है कि वह कर्म के फल से तो बचना चाहता है,पर कर्म से बचने की कोशिश नहीं करता। उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के छंटवे दिवस प्रात:कालीन धर्मसभा में व्यक्त किये । मुनि श्री ने चार बातें कर्म का बोध,कर्म का बंध,कर्म का भोग,और कर्म का क्षय की बात करते हुये कहा कि सभी को इस बात का बोध हो जाये कि मेरी आत्मा में ‘कर्म एक ऐसा तत्व है जो मेरी चेतना को परतंत्र बना रहा है। तो उसका जीवन परिवर्तित हो जाये?जब हम गहराई से अनुभव करते है,तो हमें ‘कर्म का आभास होता है,हमारे जीवन में जो भी विषमता हैं उसके मूल में कर्म ही छिपा होता है, मुनि श्री ने कहा कि कर्म का बोध मात्र शास्त्रों के पड़ने से ही नहीं आताऔरों को देखकर सड़क चलते भी हम ‘कर्म ‘का बोध कर सकते हैं।

इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर महाराज सहित समस्त क्षुल्लक महाराज मंचासीन थे। मुनि श्री के मुखारविंद से शांति मंत्रों के साथ शांतिधारा संपन्न हुई। विधानाचार्य बाल ब्र. अशोक भैया, बा. ब्र.अभय भैया के निर्देशन मेंअमित बास्तु,पंडित सुदर्शन शास्त्री, सोनल शास्त्री ने संपन्न कराया संचालन अमित पड़रिया ने किया।

इस अवसर पर पूरा पांडाल पूजा करने बालों से खचाखच भरा हुआ था । दर्शनार्थियों के लिये भारी रैंप से आने जाने की व्यवस्था थी जिससे सभी दर्शनार्थियों को गुरुदेव के दर्शन हो रहे थे। लगभग 20 हजार से ऊपर श्रद्धालुओं ने दर्शन कर लाभ उठाया।

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