मुंबई | महाराष्ट्र की राजनीति में आज भले ही समीकरण बदल गए हों, लेकिन साल 1991 का वह दौर अजित पवार की अटूट निष्ठा और त्याग के लिए याद किया जाता है। उस समय अजित पवार बारामती लोकसभा क्षेत्र से भारी मतों से जीतकर पहली बार संसद पहुँचे थे। युवा सांसद के रूप में उनका दिल्ली का सफर शुरू ही हुआ था कि देश के राजनीतिक हालात बदले और शरद पवार को संसद में प्रवेश की तत्काल आवश्यकता पड़ी। ऐसे नाजुक मोड़ पर, अजित पवार ने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को किनारे रखकर बिना किसी संकोच के अपनी जीती-जाताई लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया ताकि उनके चाचा सदन में पहुँच सकें।
संसद से इस्तीफे के बाद अजित पवार ने कभी दोबारा दिल्ली की राजनीति का रुख नहीं किया और बारामती विधानसभा को अपनी नई कर्मभूमि बनाया। उन्होंने राज्य सरकार में मंत्री के रूप में अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाया और सहकारिता क्षेत्र से लेकर ग्रामीण विकास तक में अभूतपूर्व कार्य किए। जब शरद पवार राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर दिल्ली में व्यस्त थे, तब अजित पवार ने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का एक ऐसा अभेद्य किला तैयार किया, जिसने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को महाराष्ट्र के कोने-कोने में मजबूती प्रदान की।
अजित पवार के राजनीतिक जीवन में बाद के वर्षों में कई उतार-चढ़ाव और गठबंधन के बदलाव आए, लेकिन 1991 का वह ‘महासमर्पण’ आज भी उनके व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू माना जाता है। वह दौर भारतीय राजनीति में सत्ता संघर्ष का था, जहाँ एक पद के लिए खींचतान आम बात थी, लेकिन अजित पवार ने परिवार और नेतृत्व के आदेश को सर्वोपरि रखा। उनका यह निर्णय न केवल पवार परिवार की विरासत को सुरक्षित करने वाला साबित हुआ, बल्कि इसने उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति का एक अपरिहार्य और कद्दावर चेहरा बना दिया।

