बंगाल चुनाव से पहले वाम मोर्चा और हुमायूं कबीर की मुलाकात ने बढ़ाई हलचल; 15 फरवरी तक गठबंधन का अल्टीमेटम

कोलकाता | पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की आहट के साथ ही राज्य में राजनीतिक जोड़-तोड़ का दौर शुरू हो गया है। बुधवार को न्यू टाउन के एक होटल में सीपीआई (एम) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम और ‘जनता उन्नयन पार्टी’ (JUP) के प्रमुख हुमायूं कबीर के बीच हुई एक घंटे की गुप्त मुलाकात ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। टीएमसी से निलंबित पूर्व विधायक हुमायूं कबीर, जिन्होंने हाल ही में मुस्लिम हितों और विवादित मस्जिद निर्माण जैसे मुद्दों पर अपनी नई पार्टी बनाई है, अब वामपंथियों के साथ मिलकर राज्य में एक नया मोर्चा तैयार करने की कोशिश में हैं। मोहम्मद सलीम ने हालांकि इसे एक औपचारिक मुलाकात बताया है, लेकिन उन्होंने गठबंधन विस्तार के संकेत जरूर दिए हैं।

मुलाकात के बाद हुमायूं कबीर काफी उत्साहित दिखे और उन्होंने वाम मोर्चे को 15 फरवरी तक गठबंधन की प्रक्रिया पूरी करने का कड़ा अल्टीमेटम दे दिया है। कबीर की योजना है कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) और उनकी पार्टी एक ही पाले में रहकर चुनाव लड़ें, जिससे मुस्लिम बहुल इलाकों में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके। उन्होंने ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) के साथ भी तालमेल की संभावना जताई है। गौरतलब है कि 2021 के चुनाव में वाम मोर्चे और आईएसएफ का गठबंधन बुरी तरह विफल रहा था, लेकिन अब कबीर जैसे स्थानीय चेहरों के सहारे वामपंथी दल अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की उम्मीद कर रहे हैं।

इस संभावित गठबंधन पर तृणमूल कांग्रेस ने कड़ा प्रहार किया है। टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष ने कटाक्ष करते हुए कहा कि 34 साल तक बंगाल पर राज करने वाली सीपीआई (एम) अब राजनीतिक रूप से दिवालिया हो चुकी है और चुनाव से पहले ‘भीख का कटोरा’ लेकर छोटी पार्टियों के चक्कर काट रही है। टीएमसी का मानना है कि इन छोटी पार्टियों या वामपंथियों के पास अब कोई जन समर्थन नहीं बचा है और जनता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विकास कार्यों के साथ है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह गठबंधन सफल होता है, तो यह अल्पसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण को प्रभावित कर सकता है, जिससे आने वाले चुनाव में मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है।

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