नई दिल्ली | विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए जारी किए गए नए नियमों पर विवाद गहराता जा रहा है। सवर्ण समाज के कड़े विरोध और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर कई नेताओं के इस्तीफे के बाद अब सरकार सक्रिय हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार इस मुद्दे पर व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने के लिए जल्द ही एक आधिकारिक ‘फैक्ट शीट’ जारी कर सकती है। सरकार का कहना है कि नियमों के क्रियान्वयन को लेकर विपक्ष और अन्य संगठन भ्रम फैला रहे हैं, जबकि प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि इन कड़े प्रावधानों का किसी भी निर्दोष छात्र के खिलाफ दुरुपयोग न हो सके।
UGC ने ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ के तहत हर कॉलेज में एक ‘इक्विटी कमेटी’ बनाना अनिवार्य कर दिया है। इस कमेटी को जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर 24 घंटे के भीतर कार्रवाई शुरू कर 15 दिन में रिपोर्ट सौंपनी होगी। विवाद का मुख्य बिंदु यह है कि नए नियमों में SC/ST के साथ अब OBC छात्रों को भी शामिल किया गया है। सवर्ण समाज का आरोप है कि ये नियम एकपक्षीय हैं और इसमें सवर्ण छात्रों को सीधे निशाने पर लिया गया है। वहीं, दोषी पाए जाने वाले संस्थानों की UGC मान्यता रद्द करने का कड़ा प्रावधान भी चर्चा और विरोध का विषय बना हुआ है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विरोध ‘झूठी शिकायतों’ को लेकर है। फरवरी 2025 के ड्राफ्ट में झूठी शिकायत करने वाले छात्रों पर जुर्माने का प्रस्ताव था, जिसे अंतिम नियमों से हटा दिया गया है। विरोध कर रहे संगठनों का तर्क है कि सजा का प्रावधान न होने से सवर्ण छात्रों के खिलाफ इन नियमों का उपयोग निजी रंजिश निकालने के लिए किया जा सकता है। संसद के बजट सत्र से पहले इस मुद्दे के राजनीतिक तूल पकड़ने की संभावना को देखते हुए, शिक्षा मंत्रालय जल्द ही एक संतुलित गाइडलाइन जारी कर सकता है, ताकि शैक्षणिक संस्थानों में शांति और समानता का माहौल बना रहे।

