नयी दिल्ली, 21 जनवरी (वार्ता) स्तन कैंसर की समय रहते पहचान एमआरआई-निर्देशित वैक्यूम-सहायता प्राप्त स्तन बायोप्सी (एमआरआई गाइडेड वैक्यूम-असिस्टेड ब्रेस्ट बायोप्सी) से संभव है। यह जानकारी बुधवार को अपोलो अस्पताल समूह की डॉ. प्रीथा रेड्डी वरिष्ठ उपाध्यक्ष (एग्जीक्यूटिव वाइस चेयरपर्सन) ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन में दी। उन्होंने बताया कि इस आधुनिक जांच की सुविधा अपोलो एथेना महिला कैंसर केंद्र शुरू की गयी है। डॉ. रेड्डी ने बताया कि यह एक ऐसी तकनीक है जिससे डॉक्टर स्तन कैंसर को बहुत शुरुआती अवस्था, यानी शून्य या पहले चरण में ही पहचान सकते हैं। इस स्तर पर कैंसर के लक्षण नहीं दिखते और इलाज में सफलता की संभावना बहुत अधिक रहती है।
डॉ. रेड्डी ने बताया कि कई बार मैमोग्राफी और अल्ट्रासाउंड जैसी सामान्य जांचों में भी कैंसर पकड़ में नहीं आता। अध्ययनों से पता चलता है कि हर तीन में से एक महिला में मैमोग्राफी के दौरान कैंसर छूट सकता है। जिन महिलाओं के सघन स्तन (डेंस ब्रेस्ट) होते हैं, उनमें यह खतरा और भी ज्यादा होता है। उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों में लगभग 50 प्रतिशत तक कैंसर की पहचान नहीं हो पाती। यह कैंसर बिना दर्द, बिना गांठ और बिना किसी लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ता रहता है।
डॉ. रेड्डी ने बताया कि इस तकनीक से जांच ज्यादा सटीक होती है और महिलाओं को कम तकलीफ होती है। उन्होंने बताया कि अपोलो एथेना में अब आधुनिक एमआरआई मशीनों और कृत्रिम बौद्धिकता (एआई) की मदद से स्तन एमआरआई स्कैन का समय 50 मिनट से घटकर 15 मिनट से भी कम हो गया है। इससे ज्यादा महिलायें आसानी से यह जांच करा सकती हैं, खासकर वह महिलायें जिनमें कैंसर का खतरा अधिक होता है। डॉ. ज्योति अरोड़ा, वरिष्ठ चिकित्सक, ब्रेस्ट रेडियोलॉजी विभाग ने बताया कि एमआरआई निर्देशित बायोप्सी से कई बार कैंसर को शुरू होने के साथ ही पकड़ लिया जाता है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि 70 साल की एक महिला की मैमोग्राफी सामान्य थी, लेकिन एमआरआई निर्देशित बायोप्सी से शुरू होते ही शून्य चरण में कैंसर की पहचान हुई और समय पर इलाज संभव हो सका। ज्ञात रहे कि एक अध्ययन के अनुसार, स्तन कैंसर के 14 प्रतिशत मरीज 40 साल से कम उम्र की थीं। इनमें से ज्यादातर महिलायें इलाज के लिये उस समय अस्पताल पहुंची जब बीमारी तीसरे या चौथे चरण में थी।

