जिला चिकित्सालय परिसर में फिर अराजक हुई पार्किंग व्यवस्था

सतना : जिला चिकित्सालय की ओर जाने वाले मार्ग पर सुचारु यातायात के प्रयास भले ही समय समय पर किए जाते रहे हों लेकिन परिसर के अंदर अराजक हो चुकी व्यवस्था पर जिम्मेदारों का ध्यान नहीं जा रहा है। नतीजतन अराजक हो चुकी पार्किंग व्यवस्था के चलते एक ओर एंबुलेंस जाम में फंस जा रही है। वहीं गंभीर मरीज और उनके परिजन हलाकान हुए जा रहे हैंजिला चिकित्सालय परिसर में घोषित स्थल पर पार्क भले ही नहीं नहीं बन पाया हो, लेकिन उस स्थान पर पार्किंग ठेकेदार को अवैध वसूली करने की खुली छूट देकर मरीजों की जान को सांसत में डालने का कार्य जरुर किया जा रहा है.

आलम यह है कि एक ओर जहां बेतरतीब खड़े वाहनों से अवैध वसूली कर पार्किंग ठेकेदार की जेब भर रही है वहीं दूसरी और जाम में फंसकर मरीज मौत से जूझते नजर आ रहे हैं. वहीं इस मामले में अस्पताल प्रशासन की चुप्पी लोगों के गले नहीं उतर रही है. तत्कालीन वन मंत्री और जिले के प्रभारी मंत्री विजय शाह द्वारा जिला चिकित्सालय का निरीक्षण किया गया था. उस दौरान तत्कालीन मंत्री द्वारा जिला चिकित्सालय के पार्किंग स्थल को पीछे की ओर तैयार करने और मुख्य द्वारा के सामने के स्थान को पार्क के तौर पर विकसित करने की घोषणा की गई थी. जिसके बाद अस्पताल परिसर में ट्रामा सेंटर के सामने पड़ी खाली जमीन को पार्किंग स्थल के तौर पर निर्धारित कर दिया गया.

इसी पार्किंग स्थल में खड़े होने वाहनों से शुल्क वसूली के लिए हर वर्ष अस्पताल प्रशासन की ओर से टेंडर भी निकाला जाता है. जबकि मुख्य द्वारा के सामने के स्थल को पार्क के तौर पर विकसित किए जाने की तत्कालीन मंत्रीजी की घोषणा आज तक अमल में नहीं आ सकी. जिसकी परिणिति यह हुई कि अस्पताल परिसर में बने पार्किंग स्थल में खड़े होने वाले वाहनों से शुल्क वसूलने के बजाए ठेकेदार के गुर्गों द्वारा समूचे परिसर पर ही कब्जा जमा लिया गया. आलम यह है कि अस्पताल परिसर में किसी भी कोने में वाहन के खड़े होते ही ठेकेदार के गुर्गे उस पर चैन लगा देते हैं. जिसके बाद बतौर जुर्माना 500 रु की मांग कर दी जाती है. नहीं देने पर वाहन को कोतवाली भेजने की धमकी दी जाती है.

हालात के मारे मरीज के परिजनों को आखिरकार ठेकेदार के गुर्गों को 300 से लेकर 500 रु प्रति वाहन की भेंट चढ़ानी पड़ती है. तब कहीं जाकर वाहन उनके कब्जे से मुक्त हो पाता है. इस मामले में अस्पताल चौकी का स्टाफ भी पार्किंग ठेकेदार के गुर्गों की अवैध वसूली का खुला समर्थन करता नजर आता है. बताया गया कि समर्थन पाने के लिए पार्किंग ठेकेदार द्वारा अस्पताल चौकी को प्रतिदिन 300 रु का सेवा शुल्क भी पहुंचाया जाता है. लिहाजा इस समूची व्यवस्था का लाभ जहां पार्किंग ठेकेदार की जेब में पहुंच रहा है. इतना ही नहीं बल्कि अस्पताल में ऐसे वाहन और आटो से भी अवैध वसूली कर ली जाती है जो मरीज को छोड़कर कर सीधे वहां से लौट जाते हैं. वहीं अराजक व्यवस्था का खामियाजा उन गंभीर मरीजों को उठाना पड़ता है जिन्हें तत्काल उपचार की आवश्यकता होती है. लेकिन वे जाम के चक्कर में फंसकर कराहने के लिए मजबूर दिखाई देते हैं.

 व्यवस्था छोड़ वसूली पर जोर

जिला चिकित्सालय परिसर में अनाधिकृत स्थल पर वाहनों के खड़े होने के मामले में कार्रवाई करने का अधिकार यातायात पुलिस अथवा नगर निगम के अतिक्रमण दस्ते को होता है, लेकिन इसके बावजूद भी अपने स्तर पर ही समानांतर व्यवस्था बनाकर ठेकेदार के गुर्गे हर रोज उस स्थान पर अवैध वसूली कर रहे हैं, जो उनके कार्यक्षेत्र के बाहर है. जिसके चलते परिसर में आए दिन जाम और विवाद की स्थिति बनी रहती है. ऐसा भी नहीं है कि अस्पताल प्रशासन इन स्थितियों से वाकिफ नहीं है. लेकिन अवैध वसूली को खुली छूट और अराजक पार्किंग के जरिए कौन सी व्यवस्था बनाई जा रही है यह लोगों की समझ से परे है

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