
इंदौर. ग्रामीण अंचलों में नीलगायों की बढ़ती आवाजाही और खेतों में हो रहे नुकसान को लेकर किसानों की परेशानी लगातार बढ़ रही है. जंगल से सटे क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा गंभीर है, जहां नीलगाय फसलों को नुकसान पहुंचाने के साथ गांवों में भय का माहौल भी बना रही हैं. छोटे छोटे लेकिन बार बार होने वाले नुकसान से किसानों की आजीविका पर सीधा असर पड़ रहा है.
नीलगाय संरक्षित वन्यजीव है और धार्मिक भावनाओं से जुड़ी होने के कारण इसका समाधान बेहद संवेदनशील बन जाता है. फसल क्षति के लिए मुआवजे की सरकारी व्यवस्था मौजूद है, लेकिन लंबी प्रक्रिया और बार बार होने वाले नुकसान के चलते कई किसान आवेदन तक नहीं करते, इससे समस्या और गहरी हो जाती है. वन विभाग के सूत्रों का कहना है कि नीलगायों की संख्या बढ़ने के पीछे वन्यजीव संरक्षण की सफल नीतियां हैं, लेकिन खुले इलाकों में उनकी संख्या को संतुलित करने की प्राकृतिक व्यवस्था नहीं बन पाई है. इसी चुनौती को देखते हुए इंदौर वन मंडल ने इंटीग्रेटेड ह्यूमन–वाइल्डलाइफ को-एक्जिस्टेंस मॉडल को लागू किया है, जो रोकथाम, योजना और मानवीय समाधान पर आधारित है. वन मंडल द्वारा पहले नीलगाय के हॉटस्पॉट चिन्हित किए. मैदानी रिपोर्ट और आकलन के आधार पर इंदौर रेंज के सांवेर, देपालपुर, दातूनि फायर रेंज, महू रेंज के महूगांव-किशनगंज और मानपुर रेंज के नांदलई जामिली गांव प्रमुख क्षेत्र सामने आए. जहां नीलगायों की संख्या अधिक पाई गई, वहां बोमा तकनीक अपनाई गई. यह वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीका है, जिसमें जानवरों को बिना नुकसान पहुंचाए नियंत्रित कर जंगल की ओर मोड़ा जाता है. इस तकनीक का सफल प्रयोग पहले नेट्रेक्स टेस्टिंग ट्रैक पर किया जा चुका है, जहां 51 नीलगायों को सुरक्षित रेस्क्यू कर छोड़ा था. डीएफओ इंदौर प्रदीप मिश्रा का कहना है कि यह पहल केवल रेस्क्यू तक सीमित नहीं, बल्कि दीर्घकालीन सह-अस्तित्व की दिशा में एक ठोस कदम है, जिससे वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ किसानों के हित भी सुरक्षित रह सकें.
