बेंगलुरु, 30 अक्टूबर (वार्ता) कर्नाटक दुग्ध महासंघ (केएमएफ) पर नियंत्रण की लड़ाई मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच टकराव का नया अखाड़ा बन गयी है जिससे सत्तारूढ़ कांग्रेस में गहरी होती दरार उजागर हो गयी है।
केएमएफ अध्यक्ष का पद एक साल से खाली है और बार-बार इसका चुनाव टल रहा है, क्योंकि दोनों खेमे अपने-अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को आगे कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री कोप्पल के विधायक के राघवेंद्र हितनाल का समर्थन कर रहे हैं, जिन्हें केएमएफ बोर्ड में रबकवि (रायचूर, बेल्लारी, कोप्पल और विजयनगर) संघ का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया है।
दूसरी ओर श्री शिवकुमार कथित तौर पर अपने भाई एवं पूर्व सांसद डीके सुरेश को यह प्रतिष्ठित पद दिलाने के लिए पुरजोर पैरवी कर रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि केएमएफ का अध्यक्ष पद तकनीकी रूप से एक सहयोगी भूमिका होने के बावजूद राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। पूरे कर्नाटक में 25 लाख से ज़्यादा दुग्ध उत्पादक इसके 16 दुग्ध संघों के नेटवर्क के अंतर्गत आते हैं।
एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्रों में संघ की पहुँच की ओर इशारा करते हुए कहा, “यह सिर्फ़ दूध का मामला नहीं है, यह राजनीतिक ताकत का मामला है।” केएमएफ चुनाव में देरी, संभावित मंत्रिमंडल फेरबदल और मुख्यमंत्री तथा उपमुख्यमंत्री के बीच कथित सत्ता-साझाकरण समझौते को लेकर कांग्रेस के भीतर बढ़ते तनाव के साथ हुई है।
श्री शिवकुमार के वफादारों का कहना है कि मुख्यमंत्री 20 नवंबर तक शीर्ष पद सौंपने पर सहमत हो गए हैं। वहीं श्री सिद्दारमैया खेमे का कहना है कि वह अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। इस खेमेबाजी में श्री कृष्णा बायरे गौड़ा सहित कई मंत्री भी शामिल हो गए हैं।
श्री प्रियांक खरगे और श्री सतीश जरकीहोली ने सार्वजनिक रूप से पार्टी आलाकमान के कहने पर इस्तीफ़ा देने की इच्छा जताई है,जिससे अटकलें तेज़ हो गयी हैं कि केएमएफ चुनाव से पहले फेरबदल हो सकता है।
श्री बसवराज हितनल ने संवाददाताओं से कहा, “निदेशकों ने केएमएफ प्रतिनिधि के रूप में मुझ पर भरोसा जताया है। मुझे शीर्ष पद हासिल करने का पूरा भरोसा है। अंतिम फ़ैसला मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को करना है।”
गौरतलब है कि राज्य में कांग्रेस सरकार के अगले महीने ढाई साल पूरे हो रहे हैं, ऐसे में केएमएफ चुनाव एक सहकारी प्रतियोगिता से कहीं बढ़कर बनता जा रहा है। यह तेज़ी से कर्नाटक के सत्ताधारी प्रतिष्ठान के भीतर शक्ति संतुलन का पैमाना बनता जा रहा है।
