उच्चतम न्यायालय ने अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की याचिका पर सुनवाई की

नयी दिल्ली, 13 जनवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम विस्फोटों के दोषी अबू सलेम की समय से पहले रिहायी की याचिका पर सुनवाई करते हुए उसके इस दावे पर स्पष्टीकरण मांगा कि उसने पहले ही 25 साल की जेल की सज़ा पूरी कर ली है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सलेम से उसकी जेल की सज़ा के हिसाब को सही ठहराने को कहा और उसे महाराष्ट्र राज्य के संबंधित नियम रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया ताकि यह पता लगाया जा सके कि आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां अधिनियम (टाडा) के तहत सज़ा पाए दोषी को छूट दी जा सकती है या नहीं। पीठ ने इस दावे पर सलेम के वकील से पूछा, “आप 2005 से 25 साल की सज़ा की गणना कैसे करते हैं” जब यह बताया गया कि सलेम ने पुर्तगाल से अपने प्रत्यर्पण के दौरान दिए गए भरोसे के अनुसार जेल की ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा पूरी कर ली थी। अबू सलेम को 11 नवंबर, 2005 को पुर्तगाल से एक लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद प्रत्यर्पित किया गया था। यह तब हुआ जब भारत ने पुर्तगाली अधिकारियों को भरोसा दिलाया कि पुर्तगाल के घरेलू कानून और अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों के मुताबिक उसे न तो मौत की सज़ा दी जाएगी और न ही 25 साल से ज़्यादा जेल में रखा जाएगा। इसके बाद जून 2017 में सलेम को 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में एक स्पेशल टाडा अदालत ने उसे दोषी ठहराया और उम्रकैद की सज़ा सुनाई।

इससे पहले सलेम ने प्रत्यर्पण के भरोसे के तहत समय से पहले रिहाई के लिए बॉम्बे उच्च न्यायालय का रुख किया था , साथ ही यह भी साफ़ किया था कि उसने अभी तक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्वता के मुताबिक उच्चतम न्यायालय द्वारा तय 25 साल की सज़ा पूरी नहीं की है। उच्चतम न्यायालय ने अबू सलेम बनाम महाराष्ट्र राज्य (2022) में अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि सलेम की जेल की अवधि 25 साल से ज़्यादा नहीं होगी, जिसकी गिनती 11 नवंबर, 2005 को भारत में उसके प्रत्यर्पण की तारीख से होगी। उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की पीठ ने फैसला सुनाया था कि पुर्तगाल को दिए गए भरोसे का सम्मान करने के लिए भारत सरकार सलेम को 25 साल की हिरासत पूरी होने पर रिहा करने के लिए बाध्य है। न्यायालय आगे निर्देश दिया था कि केंद्र सरकार को भारत के राष्ट्रपति को यह सलाह देनी चाहिए कि वह उक्त अवधि पूरी होने पर संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करे।

सलेम की तरफ से पेश हुए वकील ऋषि मल्होत्रा ने दलील दी थी कि पुर्तगाली कानून के तहत, उम्रकैद या 25 साल से ज़्यादा की जेल गैर-कानूनी है, और इसलिए भारत का दिया गया भरोसा मानना ज़रूरी है। सलेम को 18 सितंबर, 2002 को पुर्तगाल में अभिनेत्री मोनिका बेदी के साथ गिरफ्तार किया गया था।
प्रदीप जैन हत्याकांड मामला , 1993 के बॉम्बे बम विस्फोट मामला और अजीत दीवानी हत्या मामला के सिलसिले में प्रत्यार्पण की इजाज़त दी गई थी। ग्यारह नवंबर, 2005 को भारत आने पर सलेम को सीबीआई ने बम विस्फोट मामले में गिरफ्तार किया और बाद में मुंबई आतंक रोधी दल ने प्रदीप जैन हत्याकांड मामले में हिरासत में ले लिया। जून 2017 में एक विशेष टाडा अदालत ने अबू सलेम और पांच अन्य को 1993 में मुंबई में हुए कई बम ब्लास्ट की साज़िश रचने और उन्हें अंजाम देने का दोषी पाया। इन सिलसिलेवार बम विस्फोटों में 257 लोगों की जान चली गई थी। सलेम को भारतीय दंड संहिता , टाडा , हथियार अधिनियम , लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के अलग-अलग प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया गया था। यह मामला अभी भी उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है।

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