मऊगंज हिंसा मामले में सीबीआई की जांच आवश्यक नहीं

जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने मऊगंज में आदिवासियों परिवारों के साथ हुई हिंसा को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी थी। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष जांच संबंधित दस्तावेज के साथ स्टेटस रिपोर्ट पेश की गयी। सरकार की तरफ से बताया गया कि सीबीआई जांच की आवश्यकता नहीं है। युगलपीठ ने सरकार की तरफ से पेश किये गये जवाब पर याचिकाकर्ता को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश देते हुए अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की गयी है।

रीवा हनुमना निवासी पूर्व विधायक सुखेन्द्र सिंह बन्ना की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि मऊगंज के ग्राम गडरा में आदिवासी परिवारों की भूमि खाली कराने को लेकर भू-माफियाओं ने मारपीट की थी। पूरे मामले के हिंसक रूप लेने के दौरान जमकर उपद्रव मचा था। जिसमें ड्यूटी पर तैनात एक एएसआई की भी मौत हो गई थी। इसके बाद माफियाओं ने कई आदिवासी लोगों की हत्या कर दी, इतना ही नहीं एक ही परिवार के तीन लोग फांसी के फंदे पर लटके हुए भी पाये गये थे। आवेदक की ओर से कहा गया कि उक्त हिंसा में करीब आधा दर्जन लोगों की मौत हुई थी, वहीं करीब डेढ से दो सौ आदिवासी परिवार अपना घर बार छोडक़र गायब हो गये है, जिनका अब तक कुछ पता नहीं चला है। उक्त मामले की संबंधित अधिकारियों से लेकर उच्चाधिकारियों को शिकायत दी गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जिस पर सीबीआई जांच की मांग करते हुए हाईकोर्ट की शरण ली गई है। मामले में गृह विभाग के प्रमुख सचिव, डीजीपी रीवा, आईजी रीवा, कलेक्टर व एसपी मऊगंज, केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय के सचिव व सीबीआई को पक्षकार बनाया गया है।

युगलपीठ ने सुनवाई पश्चात सरकार को स्टेट्स रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिये थे। सरकार की तरफ से दस्तावेजों के साथ रिपोर्ट पेश करते हुए बताया गया कि याचिका में लगाये गये आरोप निराधार है। सीबीआई पर पहले ही अतिरिक्त वर्क लोड है। ऐसी स्थिति में सीबीआई की जांच आवश्यक नहीं है। याचिका की सुनवाई के बाद युगलपीठ ने उक्त आदेश जारी किये।

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