ज्ञानरंजन जी पंचतत्व में हुए विलीन

जबलपुर: संस्कारधानी को अपनी कर्मस्थली बनाने वाले यशस्वी कथाकार और सुप्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका पहल के संपादक ज्ञानरंजन जी पंचतत्व विलीन हो गये। गुरूवार सुबह उनकी अंतिम यात्रा अधारताल रामनगर स्थित निज निवास से ग्वारीघाट मुक्तिधाम के लिए प्रस्थान हुई जहां विधि-विधान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके निधन से देश भर के साहित्यिक और सांस्कृतिक गलियारों में शोक की लहर है।

उनके निधन पर नगर के साहित्यकारों ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की है।ज्ञानरंजन जी अप्रतिम कथाकार, गद्यकार और यशस्वी संपादक थे। आप 21 नवम्बर 1936 को महाराष्ट्र के अकोला में जन्मे थे। उच्च शिक्षा साहित्य के केन्द्र इलाहाबाद विवि से हासिल की। इसके बाद संस्कारधानी आए और यहां निजी कॉलेज में हिंदी प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दी। 1996 मेंं सेवानिवृत होने के बाद भी वे साहित्य के प्रति सक्रिय रहे ।

ज्ञानरंजन जी ने साढ़े तीन दशकों तक पहल पत्रिका का संपदान किया। ज्ञान रंजन जी सातवें दशक के प्रमुख कथाकारों में माने जाते है। उनके अनेक कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें कबाडख़ाना विशेष रूप से चर्चित रहा। 7 जनवरी को रात्रि 10.30 बजे 90 वर्ष की आयु में जबलपुर में उनका निधन हो गया। उन्हें 7 जनवरी को सुबह इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया था। ग्वारीघाट में गुरूवार को उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

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