देश को व्यापक टैक्स रिफॉर्म की जरूरत

संसद की ताज़ा रिपोर्ट भारत की कर-संस्कृति में आए सकारात्मक बदलाव की ओर संकेत देती है. आयकर छूट का दायरा बढ़ाए जाने के बावजूद, पिछले चार वर्षों में टैक्स चुकाने वालों की संख्या में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है. 2020-21 में दाखिल 6.72 करोड़ आयकर रिटर्न में से 1.88 करोड़ लोगों ने वास्तविक टैक्स चुकाया था, जबकि 4.84 करोड़ लोग जीरो टैक्स रिटर्न फाइलर थे. अब यही श्रेणी 15 प्रतिशत बढ़ी है, जो बताती है कि अधिक नागरिक आय घोषित करने और औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने को तैयार हैं. इन बदलावों के पीछे डिजिटल सुधारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. ई-फाइलिंग सिस्टम का सरलीकरण, प्री-फिल्ड फॉर्म्स, ऑनलाइन सत्यापन और बैंकिंग नेटवर्क का विस्तार ने अनुपालन को सहज बनाया है. डिजिटल भुगतान, यूपीआई आधारित लेन-देन और डेटा एनालिटिक्स ने आय के स्रोतों को ट्रैक करना आसान किया है, जिससे कर चोरी पर नियंत्रण संभव हुआ है. औपचारिक रोजगार में वृद्धि और स्टार्टअप-इकोसिस्टम का विस्तार भी नए टैक्सपेयर वर्ग को जोड़ रहा है. लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर है. टैक्स अदा करने वालों में सबसे बड़ा वर्ग अभी भी नौकरीपेशा लोगों का है,सरकारी और निजी कर्मचारियों का, जिनकी आय स्रोत पर ही कटौती के माध्यम से कराधान के दायरे में आ जाती है. इसके विपरीत, बड़े कारोबारी समूहों और उच्च आय वर्ग की वास्तविक कर-देयता अपेक्षाकृत कम बनी हुई है. आय छिपाव, प्रॉफिट-शिफ्टिंग, और जटिल आर्थिक संरचनाओं के सहारे टैक्स भार को न्यूनतम करने की प्रवृत्ति अब भी बरकरार है. यही कारण है कि भारत का टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात अभी वैश्विक मानकों से नीचे है.

भारत ने जीएसटी के रूप में अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में व्यापक सुधार लागू किए, परंतु प्रत्यक्ष कर ढांचे में ऐसी निर्णायक पहल अभी बाकी है. उच्च आय वर्ग के लिए अधिक प्रगतिशील कर-स्लैब, कॉरपोरेट टैक्स में वास्तविक प्रभावी दरों की पारदर्शिता, और पेशेवर एवं व्यापारिक आय पर सख्त अनुपालन व्यवस्था,ये कदम लंबे समय से लंबित हैं. यदि सुधारों का फोकस केवल वेतनभोगी वर्ग तक सीमित रहा, तो टैक्स बेस का विस्तार असमान और आंशिक ही रहेगा.

दरअसल यही वर्ग भविष्य में संभावित करदाता बन सकता है. नई टैक्स व्यवस्था के तहत मध्यम वर्ग को दी गई छूट उपभोग को प्रोत्साहित करती है, जो अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ाने वाला कारक है. किंतु केवल छूट आधारित नीति विकासोन्मुख कर ढांचे का विकल्प नहीं बन सकती. अब आवश्यकता है,व्यापक प्रत्यक्ष कर सुधारों की, जिनमें डायरेक्ट टैक्स कोड का प्रभावी क्रियान्वयन, एआई-आधारित ऑडिट सिस्टम और जोखिम-आधारित जांच तंत्र जैसे उपाय शामिल हों. कुल मिलाकर भारत का कर तंत्र एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. बढ़ते कर-अनुपालन और डिजिटल सुधारों ने कर-संस्कृति को सशक्त किया है, लेकिन टैक्स संरचना का बोझ अभी भी असमान रूप से वेतनभोगी वर्ग पर केंद्रित है. आर्थिक न्याय तभी सुनिश्चित होगा, जब व्यापारिक और उच्च आय वर्ग भी समुचित रूप से कर-जिम्मेदारी निभाए. व्यापक प्रत्यक्ष कर सुधार, कॉरपोरेट टैक्स पारदर्शिता, पेशेवर आय के बेहतर ऑडिट तंत्र और डायरेक्ट टैक्स कोड के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ ही भारत टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात को वैश्विक मानकों के करीब ला सकता है. यदि सरकार जीएसटी जैसे साहसिक दृष्टिकोण को आयकर क्षेत्र में भी लागू करे, तो कराधान केवल राजस्व संग्रह का माध्यम नहीं रहेगा,बल्कि समावेशी विकास, सामाजिक समानता और मजबूत अर्थव्यवस्था की आधारशिला बन सकेगा.

 

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