
डिंडोरी, नवभारत — जिले में धान खरीदी की जमीनी हकीकत जाननी हो तो जिला मुख्यालय से सटे लैंप्स कुकर्रामठ अंतर्गत सरहरी उपार्जन केंद्र की तस्वीर काफी है। यहां नियम-कायदों की ऐसी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं कि अन्नदाता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। दो दिनों से वारदाने की किल्लत झेल रहे किसानों का सब्र आखिरकार जवाब दे गया और गुस्साए किसानों ने जबलपुर–अमरकंटक हाइवे करीब आधे घंटे तक जाम कर दिया। देखते ही देखते सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं । संयोग से मौके से गुजर रहे एसडीओपी डिंडोरी सतीश द्विवेदी ने हालात की नजाकत को भांपते हुए तत्काल मोर्चा संभाला। किसानों को समझाइश देकर जाम खुलवाया और फिर जिम्मेदारों को मौके पर ही जमकर फटकार लगाई, तब जाकर हालात काबू में आए।
किसान बने मजदूर, व्यवस्था बेपर्दा —
आक्रोशित किसानों का आरोप है कि सरहरी खरीदी केंद्र में वे सिर्फ किसान नहीं, बल्कि मजदूर और हम्माल भी वही बन रहे हैं। बोरी ढोने से लेकर तौल तक का सारा काम किसान और उनके परिवार करते दिखे। जब इस संबंध में केंद्र के जिम्मेदारों से सवाल किए गए तो दावा किया गया कि यहां 25 मजदूर तैनात हैं। लेकिन हकीकत यह रही कि पूरा केंद्र घुमाने के बाद बमुश्किल एक सजा–धजा व्यक्ति मिला, जिसे देखकर मजदूर होने का कोई अंदाजा नहीं लगा। रजिस्टर में जरूर 22 मजदूरों के नाम दर्ज मिले, लेकिन मौके पर एक भी नजर नहीं आया। सवाल साफ है नाम कागजों में, मजदूर गायब!
प्रति बोरी 200 ग्राम ‘कटौती’, खुली लूट का आरोप — किसानों ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि तौल के नाम पर प्रति बोरी 200 ग्राम अतिरिक्त लिया जा रहा है। यह सीधे-सीधे किसानों की जेब पर डाका है। इस मुद्दे पर जब जिम्मेदारों से जवाब मांगा गया तो वे गोलमोल जवाब देकर बचते नजर आए। इतना ही नहीं, किसानों का यह भी आरोप है कि खरीदी केंद्र प्रभारी अपने चहेतों को पहले वारदाने उपलब्ध करा रहे हैं, जबकि बाकी किसानों को घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा है। यही वजह है कि केंद्र पर अव्यवस्थाएं बेलगाम हो चुकी हैं।
लक्ष्य 40 हजार, खरीदी 24 हजार पार —
लैंप्स प्रबंधक के मुताबिक सरहरी खरीदी केंद्र को 40 हजार क्विंटल धान खरीदी का लक्ष्य मिला था। अब तक 24220.4 क्विंटल की खरीदी हो चुकी है और यह आंकड़ा 50 हजार क्विंटल तक पहुंच सकता है। वजह साफ है—यहां किसानों को एक-दो दिन में भुगतान मिल रहा है, जिसके चलते आसपास के क्षेत्रों के किसान भी इसी केंद्र की ओर रुख कर रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जब खरीदी बढ़ रही है, भुगतान हो रहा है, तो फिर वारदाने की किल्लत, मजदूरों की कमी और किसानों से हो रही कथित लूट की जिम्मेदारी कौन लेगा?
फिलहाल सरहरी उपार्जन केंद्र की यह तस्वीर प्रशासन और व्यवस्था दोनों के लिए कड़ा सवाल खड़ा कर रही है—क्या अन्नदाता की मेहनत यूं ही सड़क पर उतरकर इंसाफ मांगती रहेगी?
