महाकौशल की डायरी
अविनाश दीक्षित
जबलपुर में भाजपा के ऑलीशान दफ्तर को देख-देखकर शहर कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ नेता से लेकर पार्टी के हर एक कार्यकर्ता मन ही मन व्यथित हो रहे हैं। दबी जुबान से अंदर ही अंदर हीनता का भाव कांग्रेसियों में नजर आ रहा है.. इसकी मुख्य वजह जबलपुर में कांग्रेस पार्टी का खुद की जमीन पर कार्यालय अभी तक स्थापित न कर पाना है। जबलपुर कांग्रेस के इतिहास की बात करें तो अभी तक जितने भी नगर अध्यक्ष रहे हैं उन्होनें अपनी ही जमीन पर या किराए की जगह लेकर पार्टी का कार्यालय संचालित किया है।
मौजूदा नगर अध्यक्ष सौरभ नाटी शर्मा भी अपने स्थान से पार्टी का कार्यालय संचालित करते नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस से पहले जुड़े हुए ऐसे नेता जो अब भाजपा का दामन थाम चुके हैं वे दो टूक कहते नजर आ रहे हैं कि शहर कांग्रेस के दिग्गजों ने सरकार रहते वक्त सत्ता का सही उपयोग नहीं किया और न ही शहर में पार्टी कार्यालय के लिए गंभीर होकर कोई रूचि दिखाई जिसका नतीजा है कि आज कांग्रेस पार्टी के पास खुद का कार्यालय उनकी जमीन पर मौजूद नहीं है। ऐसे में शहर कांग्रेस से जुड़ा हर एक नेता, कार्यकर्ता ये भी कहने मजबूर हो रहा है कि हम लोगों का ये सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।
पार्टी के अंदरखाने से खबर निकलकर आ रही है कि शहर के बीचों-बीच करीब 10 . 34 एकड़ जमीन की प्रॉपर्टी कांग्रेस के पास है जिसमें एक भवन और चार बड़े ग्राउंड शामिल हैं लेकिन पिछले कई सालों से इस जमीन पर एक परिवार ने महाकोशल शहीद स्मारक ट्रस्ट के नाम पर कब्जा जमा रखा है। अब तो कांग्रेसी ये भी कहने लगे हैं कि शहीद स्मारक गोलबाजार में अनेक आयोजन हो सकते हैं तो क्या पार्टी का कार्यालय नहीं खुल सकता। स्थानीय कांग्रेस के इतिहास के मुताबिक कांग्रेस के पूर्व नगर अध्यक्ष शिवनाथ साहू, चंद्रकुमार भनोत, राममूर्ति मिश्रा, नरेश सराफ, दिनेश यादव, पूर्व अध्यक्ष और अब भाजपा में शामिल महापौर जगत बहादुर अन्नू ने अपने-अपने स्थान से पार्टी का कार्यालय जबलपुर में संचालित किया है। ये नेता कद्दावर होने के साथ ही आर्थिक रूप से सक्षम भी रहे हैं मगर इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
कहीं अंदर ही अंदर न सुलग जाए चिंगारी….
संभाग के सबसे बड़े नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल के करीब एक हजार कर्मचारी बीते कई माह से अपने साथ हो रहे भेदभाव को लेकर काफी आक्रोशित हो चुके हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि कहीं ये आक्रोश सड़कों पर न उतर जाए और एक बड़े आंदोलन का रूप न ले। वजह नेशनल पेंशन स्कीम के रुपयों का पता न चलना है। देखा जा रहा है कई दिनों से कर्मचारी अपने खातों में इस स्कीम के तहत कितने रुपए जमा होने का पता लगा रहे हैं लेकिन उनको कोई जानकारी नहीं दे रहा है।
ऐसे में कर्मचारी मेडिकल के गलियारों में दो टूक कहते हुए भी नजर आ रहे हैं कि यदि ये समस्या डॉक्टर्स से जुड़ी होती तो तुरंत उसका निराकरण कर दिया जाता चूंकि समस्या कर्मचारियों से जुड़ी है इसलिए भेदभाव हो रहा है। जानकारी के अनुसार कर्मचारियों की कर्मचारी भविष्य निधि की राशि काटी जाती थी। बाद में 1 अप्रैल 2018 को मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में एनपीएस (नेशनल पेंशन स्कीम) योजना लागू की गई। इसके बाद सीपीएफ से काटी गई राशि को एनपीएस खाते में जमा किया जाने लगा था। हालांकि मेडिकल अधीक्षक ने कर्मचारियों को आश्वासन तो दिया है कि डीन साहब से मिलकर उनकी समस्या का निराकरण किया जाएगा।
लेकिन आश्वासन के बाद भी कर्मचारियों के खेमे में असंतोष की आग शांत नहीं हो रही है।
परिंदों के आशियाने को कचरे में फेंकने वाला कौन…?
अभी कर्मचारी संघ अध्यक्ष और कर्मचारियों के दूसरे गुट का विवाद थमा ही नहीं था कि रानीदुर्गावती विश्वविद्यालय एक बार फिर से अधिकारी- कर्मचारियों के कारनामे से सुर्खियों में आ गया है। ताजी तस्वीर विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यालय के पास रद्दी की तरह कचरे में पड़े वन विभाग और टिंबर एसोसिएशन द्वारा नि:शुल्क दिए गए पक्षियों के घरौंदे से जुड़ी है जिसको जिसने देखा वो हैरान हो गया। पक्षियों के घरौंदे नाम मात्र के लिए विवि में लगाए गए और बाकी को कचरा समझकर फेंक दिया गया। इन सब के पीछे का गुनाहगार कौन है ये सवाल अब भी बरकरार है। जानकारों का कहना है कि हमेशा की तरह इस बार भी लापरवाह अधिकारी- कर्मचारियों की करतूत पर पर्दा डाल दिया जाएगा।
हालांकि मामला संज्ञान में आने के बाद कुलगुरू जरूर कहते नजर आ रहे हैं कि मैं पता लगाऊंगा कि पक्षियों के घरौंदे किसने फेंके हैं और फिर संबंधित के खिलाफ सख्त कार्रवाई करूंगा लेकिन विवि के सूत्र कह रहे हैं कि ये कोरी बयानबाजी है, क्योंकि अब तक लापरवाह अधिकारी- कर्मचारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है जिस कारण लापरवाही और भर्राशाही विवि में पिछले कई महीनों से अपने चरम पर पहुंच चुकी है। विदित हो कि वन विभाग के अधिकारियों और टिम्बर एसोसिएशन के साथ मिलकर पक्षियों के आवास के लिए करीब 200 से अधिक लकड़ी के घरौंदे वितरित किए गए थे, ताकि परिसर में मौजूद पक्षियों को सुरक्षित और आरामदायक स्थान मिल सके, लेकिन इन घरौंदों को कचरे के ढेर में फेंक दिया गया।
