
बैतूल। न्यायालयों में कई बार जटिल पारिवारिक मामलों का समाधान केवल कानून की धाराओं से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और सही उदाहरणों से भी संभव हो जाता है।
मध्यप्रदेश के बैतूल के कुटुंब न्यायालय में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहां न्यायाधीश द्वारा दिए गए धार्मिक और नैतिक उदाहरणों ने बेटे को अपनी मां को भरण-पोषण राशि देने के लिए सहमत कर दिया।
मामला उस समय कुटुंब न्यायालय पहुंचा, जब एक मां ने अपने बेटे के विरुद्ध भरण-पोषण राशि प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। बेटे का तर्क था कि वह अपनी मां को अपने साथ रखकर उसका पालन-पोषण करने को तैयार है, इसलिए अलग से भरण-पोषण राशि देना उसके लिए संभव नहीं है। वहीं मां का कहना था कि बहू का व्यवहार उसके प्रति ठीक नहीं है, जिसके कारण वह बेटे के साथ नहीं रह सकती।
मामला लंबा खिंचने से पहले ही मध्यस्थता के दौरान सुलझ गया। कुटुंब न्यायालय के न्यायाधीश शिवबालक साहू ने बेटे को धार्मिक संदर्भों के माध्यम से समझाइश दी। उन्होंने कहा कि माता-पिता संतान के लिए देवता के समान होते हैं। जैसे व्यक्ति मंदिर जाकर अपनी श्रद्धा से चढ़ावा चढ़ाता है, वैसे ही माता-पिता की सेवा भी पुण्य का कार्य है।
न्यायाधीश ने यह भी समझाया कि माता-पिता जहां रहते हैं, वही स्थान संतान के लिए मंदिर के समान होता है। यदि व्यक्ति अपने माता-पिता की सेवा करता है, तो उसकी संतान भी आगे चलकर उसकी सेवा करेगी। इस भावनात्मक और नैतिक समझाइश का असर यह हुआ कि बेटे ने अपनी मां को प्रतिमाह 8,000 रुपये भरण-पोषण राशि बैंक खाते के माध्यम से देने पर सहमति जता दी।
मां ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और आपसी सहमति से मामले का सद्भावनापूर्ण निपटारा हो गया। इसके बाद दोनों पक्ष संतुष्ट होकर न्यायालय से लौटे।
