
भोपाल। मध्यप्रदेश में किन्नर ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए लंबे समय से लंबित राज्य उभयलिंगी कल्याण बोर्ड के गठन को लेकर सरकार ने बड़ा दावा किया है। सामाजिक न्याय एवं निशक्तजन कल्याण विभाग के मंत्री नारायण सिंह कुशवाह ने सोमवार को भोपाल में आयोजित प्रेसवार्ता में कहा कि “राज्य उभयलिंगी कल्याण बोर्ड के गठन की पूरी तैयारी कर ली गई है और एक सप्ताह के भीतर बोर्ड का औपचारिक गठन कर दिया जाएगा।”
मंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है, जब ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 और नियम 2020 के बावजूद मध्यप्रदेश में लगभग छह साल बाद भी राज्य स्तरीय बोर्ड का गठन नहीं हो पाया है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद बोर्ड न बनने से किन्नर समुदाय को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पहचान पत्र और सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
गौरतलब है कि वर्ष 2020 में अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति संस्थान ने ट्रांसजेंडर्स के संरक्षण और उत्थान के लिए एक विस्तृत नीति तैयार कर सामाजिक न्याय विभाग को सौंपी थी। इस नीति के तहत राज्य उभयलिंगी कल्याण बोर्ड के गठन का स्पष्ट प्रावधान था, जिसे वर्ष 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कैबिनेट से मंजूरी भी मिल चुकी थी। इसके बावजूद अब तक बोर्ड का गठन नहीं हो सका और फाइल मंत्रालय में लंबित रही।
सामाजिक न्याय विभाग के अनुसार प्रदेश में वर्तमान में 55 जिले हैं, जिनमें से 47 जिलों में जिला उभयलिंगी कल्याण बोर्ड गठित किए जा चुके हैं। सामाजिक न्याय विभाग के अधिकारियों के अनुसार शेष जिलों में भी प्रक्रिया जारी है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि जब तक राज्य स्तर पर सशक्त बोर्ड का गठन नहीं होगा, तब तक जिला स्तरीय बोर्ड प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाएंगे।
राजधानी भोपाल में गठित जिला उभयलिंगी कल्याण बोर्ड की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में रही है। बोर्ड के सदस्यों के अनुसार पिछले दो वर्षों में केवल दो बैठकें हुईं और उनमें भी चर्चा टीजी कार्ड तक सीमित रही। एक जानकारी के अनुसार प्रदेशभर में अब तक मात्र 905 ट्रांसजेंडर पहचान पत्र बनाए जा सके हैं, जो सरकारी दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर दर्शाता है।
देश के अन्य राज्यों की तुलना करें तो 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड गठित हो चुके हैं, जबकि मध्यप्रदेश अब तक इस सूची से बाहर रहा है। ऐसे में मंत्री द्वारा एक सप्ताह में बोर्ड गठन का आश्वासन किन्नर समुदाय के लिए उम्मीद की नई किरण के रूप में देखा जा रहा है।
अब देखना यह होगा कि वर्षों से अधर में लटकी यह प्रक्रिया वास्तव में तय समयसीमा में पूरी होती है या फिर राज्य उभयलिंगी कल्याण बोर्ड की फाइल एक बार फिर मंत्रालय की अलमारियों में धूल खाती रह जाती है।
