भारत और ‘ग्लोबल एजुकेशन हब’

नीति आयोग द्वारा जारी उच्च शिक्षा पर ताज़ा रोड मैप केवल एक नीतिगत दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक शैक्षणिक पहचान को पुनर्गठित करने वाला दूरदर्शी प्रस्ताव है. लंबे समय से भारत उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आउट बाउंड नेशन की तरह देखा जाता रहा है,जहां लाखों छात्र बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश जाते हैं, लेकिन विदेशी छात्र भारत आने से हिचकते हैं. आयोग द्वारा प्रस्तुत आंकड़े इस असंतुलन की कठोर सच्चाई सामने रखते हैं कि 28 भारतीय छात्रों के विदेश जाने के मुकाबले केवल 1 विदेशी छात्र भारत आता है. इसके कारण भारत न केवल प्रतिभा खोता है, बल्कि भारी आर्थिक निकास का भी सामना करता है. विदेश में पढ़ रहे लगभग 13.5 लाख भारतीय छात्र हर वर्ष करीब 6 लाख करोड़ रुपये खर्च करते हैं,जो हमारे शिक्षा बजट से कई गुना अधिक है. यह केवल ब्रेन ड्रेन नहीं, बल्कि फाइनेंशियल ड्रेन भी है. ऐसे में नीति आयोग का 2027 तक 11 लाख विदेशी छात्रों को भारतीय कैंपस में लाने का लक्ष्य शिक्षा अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की बड़ी संभावना पैदा करता है. अनुमानित 5 लाख करोड़ रुपये का राजस्व भारतीय विश्वविद्यालयों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत बनाएगा.

परंतु महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या केवल आंकड़े और लक्ष्य पर्याप्त होंगे ? भारत को ग्लोबल एजुकेशन हब बनाने के लिए शिक्षा की गुणवत्ता, अनुसंधान-संस्कृति और अकादमिक वातावरण में गहरे सुधार आवश्यक हैं. विदेशी छात्रों को आकर्षित करने के लिए विश्वस्तरीय पाठ्यक्रम, उद्योगों की सहभागिता, प्रयोगशालाओं और बहुभाषीय समर्थन प्रणालियों का विकास करना होगा. साथ ही, भारतीय विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग केवल ब्रांडिंग से नहीं, बल्कि शिक्षा के वास्तविक मानकों से सुधरेगी,जहां फैकल्टी विकास, शोध-प्रकाशन और नवाचार निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

आयोग द्वारा सुझाए गए कदम,वीजा सरलीकरण, ‘स्टडी इन इंडिया’ पोर्टल का विस्तार, स्कॉलरशिप और आवासीय सुविधाओं का उन्नयन,निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं. इसी के साथ आयुष, योग, भारतीय दर्शन और संस्कृति आधारित कोर्सेज भारत की शैक्षणिक पहचान को विशिष्ट बनाते हैं. यदि इन विषयों को आधुनिक अकादमिक ढांचे में समाहित किया जाए, तो वे भारत की सॉफ्ट पावर को नए आयाम दे सकते हैं. हालांकि, इस यात्रा में कुछ सावधानियां भी आवश्यक हैं. विदेशी विश्वविद्यालयों को कैंपस खोलने की अनुमति प्रतिस्पर्धा तो बढ़ाएगी, परंतु यह सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय संस्थान उनकी छाया में दब न जाएं. यह मॉडल संतुलित सहभागिता पर आधारित होना चाहिए, न कि एकतरफा बाजारीकरण पर. शिक्षा को केवल राजस्व के दृष्टिकोण से देखना भी उचित नहीं होगा. दरअसल,इसका मूल उद्देश्य मानव संसाधन का विकास और चिंतन की स्वतंत्रता होना चाहिए.

इस पहल का एक बड़ा लाभ यह भी हो सकता है कि विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों के लिए उत्कृष्ट संस्थान यहीं उपलब्ध हों. यदि भारत में विश्वस्तरीय शोध सुविधाएं और वैश्विक एक्स्पोज़र तैयार होता है, तो ब्रेन ड्रेन स्वाभाविक रूप से घटेगा. भारत तभी सच्चे अर्थों में ज्ञान आधारित आर्थिक शक्ति बनेगा, जब हमारे विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले केंद्र न रहकर विचार-निर्माण के मंच बनें.

नीति आयोग की यह पहल सही दिशा में बढ़ता कदम है,परंतु इसका सफलता का समीकरण शिक्षा की गुणवत्ता, पारदर्शी प्रशासन और दीर्घकालिक निवेश से ही तय होगा. यदि भारत इस अवसर को रणनीतिक एवं जिम्मेदार दृष्टि से प्राप्त कर पाया, तो वह न केवल ग्लोबल एजुकेशन हब बनेगा, बल्कि विश्व मंच पर अपनी पुरातन ‘विश्व गुरु’ परंपरा को आधुनिक अर्थों में पुन: स्थापित भी कर सकेगा.

 

 

 

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