उज्जैन: 22 दिसंबर को सूर्य के दक्षिणायन से उत्तर की ओर गति प्रारंभ होने के खगोलीय क्षण को उज्जैन के जीवाजी वेधशाला (जंतर-मंतर) में विशेष रूप से देखा-समझा गया.इस दिन पृथ्वी की धुरी झुकाव के कारण वर्ष का सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात होती है. उज्जैन में सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच दिन लगभग 10 घंटे 41 मिनट रहा, वहीं रात करीब 13 घंटे 19 मिनट तक रही. इस वैज्ञानिक घटना को समझने के लिए वेधशाला में सैकड़ों पर्यटक, शोधार्थी और स्थानीय नागरिक पहुंचे और विशेषज्ञों से विस्तारपूर्वक जानकारी ली.
प्राचीन वेधशाला के यंत्रों से किया गया अवलोकन
नवभारत से चर्चा में वेधशाला के अधीक्षक आरपी गुप्त ने बताया कि सूर्य का मकर रेखा के करीब पहुंचना और पृथ्वी का झुकाव वर्ष के इस दिन को विशिष्ट बनाता है. शंकु-यंत्र और अन्य प्राचीन मापक उपकरणों के सहारे सूर्य की स्थिति, किरणों के कोण और छाया की लंबाई का प्रत्यक्ष अवलोकन किया गया. इस दिन छाया सबसे लम्बी दिखाई देती है, जो मकर रेखा पर सूर्य के लम्बवत पहुंचने का संकेत देती है.
राजा जयसिंह के काल से उज्जैन में हो रहा अध्ययन
खगोलशास्ति्रयों ने बताया कि उज्जैन प्राचीन काल से समय-निर्धारण और खगोलीय गणनाओं का केंद्र रहा है. राजा जयसिंह द्वितीय के शासनकाल में बनाए गए जंतर-मंतर के उपकरण आज भी सूर्य की स्थिति, क्रांति, विषुव तथा अयनांत जैसे खगोलीय परिवर्तनों को समझने में उपयोगी हैं. उज्जैन की भौगोलिक स्थिति—0 देशांतर के संदर्भ में भारतीय समय गणना के लिए महत्व रखती है- जिसके कारण यहां सदियों से खगोलीय अध्ययनों की परंपरा कायम है.
पर्यटकों और आगंतुकों ने प्रत्यक्ष देखा खगोलीय तथ्य
दिनभर वेधशाला में आगंतुकों का तांता लगा रहा. कई पर्यटक इस दुर्लभ क्षण को प्रत्यक्ष देखने के लिए विशेष रूप से उज्जैन पहुंचे. स्थानीय विद्यार्थियों ने सूर्य की किरणें कैसे बदलती हैं, दिन-रात की अवधि कैसे घट-बढ़ होती है, इसका वैज्ञानिक कारण समझा. खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों ने विशेषज्ञों से बातचीत कर ज्ञानवर्धन किया.
अब दिन बढ़ने और रात घटने का सिलसिला शुरू
विशेषज्ञों के अनुसार 22 दिसंबर के बाद सूर्य उत्तर की ओर गति करता है, जिसे उत्तरायण की शुरुआत माना जाता है. आने-वाले दिनों में दिन की अवधि बढ़ने और रात कम होने का क्रम जारी रहेगा, जो मार्च में विषुव के समय दिन-रात समानता पर जाकर स्थिर होगा.
