सिर्फ़ एक लाइन का आदेश जारी करना निंदनीय

जबलपुर। सरकार की तरफ से दायर अपील की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि सिर्फ एक लाइन का आदेश जारी करना निंदनीय है। अपीलीय कोर्ट के किसी ज्यूडिशियल ऑफिसर से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह केस की मेरिट्स पर बिना जाए और सबूतों पर चर्चा किए बिना इतना छोटा, रहस्यमय और बिना तर्क आदेश जारी कर दें। हाईकोर्ट जस्टिस राजेन्द्र कुमार वाणी ने उक्त अपीलीय कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए पुनः प्रकरण की सुनवाई के आदेश जारी किये हैं।

सरकार की तरफ से दायर की गई भोपाल जिला न्यायालय के अपीलीय कोर्ट के द्वारा अनावेदक बाबूलाल मालवीय को दोषमुक्त किये जाने को चुनौती दी गयी थी। अपील में कहा गया था कि अनावेदक ट्रायल कोर्ट ने धारा 323 के तहत 6 माह की सजा से दंडित किया था। सजा के खिलाफ दायर की गयी अपील को स्वीकार करते हुए अपीली कोर्ट ने उसे दोषमुक्त कर दिया। अपील कोर्ट ने बिना कोई कारण बताए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सज़ा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। अपील कोर्ट का ऑर्डर बहुत छोटा, रहस्यमय और बिना तर्क का है। गैर-कानूनी आदेश होने के कारण निरस्त करने योग्य है।

एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अपीलीय कोर्ट ने अपने आदेश में सिर्फ इतना लिखा है कि उभय पक्ष के तर्क सुनने तथा विचारण न्यायालय से आये मूल प्रकरण का अवलोकन किया गया। अपील स्वीकार करने योग्य है और दंडादेश अपास्त किया जाता है। कानूनी सिद्धांतों के अनुसार अपील कोर्ट का दिया गया विवादित फैसला मानने लायक नहीं है। ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करने के लिए कोई वजह नहीं बताई गई है। विवादित फैसले से पता चलता है कि अपील कोर्ट का तरीका निंदनीय है। विवादित फैसला रद्द किया जा सकता है और मामले को कानून के मुताबिक नए सिरे से फैसला करने के लिए अपील कोर्ट को वापस भेजा जाता है।

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