
भोपाल: मध्यप्रदेश में बाल सुरक्षा तंत्र की स्थिति पर गंभीर सवाल तब खड़े हो गए जब पूर्व मंत्री एवं राघौगढ़ विधायक जयवर्धन सिंह ने विधानसभा में नाबालिग बच्चियों के बाल विवाह के बढ़ते मामलों को लेकर प्रश्न उठाया। सरकार के लिखित जवाब में सामने आए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच बाल विवाह के मामलों में लगातार इजाफा हुआ है, जबकि प्रदेश में बाल विवाह पूरी तरह प्रतिबंधित है।
सिंह ने सरकार और महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्यप्रणाली की कठोर आलोचना करते हुए कहा कि करोड़ों रुपये खर्च करने, अनेक योजनाएँ चलाने और बार-बार जागरूकता अभियानों के दावे करने के बावजूद बाल विवाह रोकथाम पर कोई ठोस असर दिखाई नहीं देता। उन्होंने कहा, “आश्चर्य की बात है कि इतने खर्च और प्रयासों के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।”
सरकार का दावा है कि प्रदेशभर में बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी नियुक्त हैं, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के तहत हर माह गतिविधियाँ आयोजित होती हैं, अक्षय तृतीया और देव उठनी एकादशी पर विशेष जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, और नुक्कड़ नाटक, कार्यशालाएँ, रैलियाँ आदि निरंतर आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा जिला और ब्लॉक स्तर पर विशेष टीमें, सूचना दल और कंट्रोल रूम भी सक्रिय हैं।
जयवर्धन सिंह का कहना है कि बढ़ते आँकड़े सरकार की नाकामी का स्पष्ट संकेत हैं। उन्होंने प्रोहिबिशन ऑफ चाइल्ड मैरिज एक्ट, 2006 का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की और 21 वर्ष से कम उम्र के लड़के का विवाह कानूनन अपराध है, जिसमें दो वर्ष तक की सजा या एक लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
उन्होंने मांग की कि सरकार कागज़ी कार्यवाही से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर प्रभावी कदम उठाए, ताकि नाबालिग बेटियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
