नयी दिल्ली, 27 नवंबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि बिहार में हुए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए ‘स्पष्ट औचित्य’ की आवश्यकता हो सकती है, क्योंकि यह मतदाता सूचियों को अद्यतन बनाने की कोई नियमित कार्रवाई नहीं थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने एसआईआर की वैधता को चुनौती देने वाली और इस प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह बात कही।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल) और कई राजनीतिक दलों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि एसआईआर प्रक्रिया का कानून में कोई आधार नहीं है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा उचित नियमों के बिना इतने बड़े पैमाने का अभ्यास शुरू नहीं किया जा सकता है।
श्री सिंघवी ने कहा, “यह एक सामूहिक अभ्यास है। अनुच्छेद 324 ऐसी शक्तियाँ नहीं देता है। आयोग एक कानून बनाने वाले की तरह कार्य नहीं कर सकता।”
मुख्य न्यायाधीश ने जवाब में टिप्पणी की, “आपके तर्क को मानें, तो आयोग के पास कभी भी एसआईआर आयोजित करने की शक्ति नहीं होगी। यह नियमित कार्रवाई नहीं है। यदि एक विशेष पुनरीक्षण किया जा रहा है, तो प्रक्रिया को न्यायसंगत ठहराने की आवश्यकता हो सकती है।”
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुनवाई की शुरुआत में सवाल किया कि क्या बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) यह आकलन कर सकते हैं कि कोई मतदाता ‘अस्वस्थ मस्तिष्क’ का है या नहीं।
श्री सिब्बल ने तर्क दिया, “बीएलओ के रूप में नियुक्त एक स्कूल शिक्षक यह तय नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत मस्तिष्क की अस्वस्थता किसी अदालत द्वारा घोषित की जानी चाहिए।”
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत को यह जांचना होगा कि एसआईआर के लिए जारी किया गया नोटिस चुनाव कानूनों की योजना के अनुरूप है या नहीं।
श्री सिब्बल ने चेतावनी दी कि मतदाताओं पर अतार्किक बोझ पड़ सकता है। उन्होंने कहा, “अगर मेरे पिता का नाम सूची से गायब है, तो मैं इसे कैसे साबित करूँगा? यह किस शक्ति के तहत किया जा रहा है?”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मतदाताओं को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका विवरण सही है। उन्होंने टिप्पणी की, “अगर आपके पिता का नाम गायब है और आपने भी कार्रवाई नहीं की, तो शायद आपने अवसर गंवा दिया।”
श्री सिंघवी ने बाद में जोर दिया कि संविधान चुनाव आयोग को प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से वास्तविक बदलाव करने की अनुमति नहीं देता है। उन्होंने कहा, “आयोग संसद का तीसरा सदन नहीं है। यह मतदाताओं के लिए ऐसी नई शर्तें नहीं ला सकता, जो कानून के द्वारा प्रदान नहीं किया गया है।”
मुख्य न्यायाधीश ने एक अन्य सवाल भी उठाया, “अगर कल संसद कहती है कि मौलिक अधिकारों को छीना जा सकता है, तो क्या ऐसा किया जा सकता है?” श्री सिंघवी ने जवाब दिया, “नहीं। सीमाएं हैं। कानूनी समर्थन के बिना सामूहिक बदलाव की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
मुख्य न्यायाधीश ने मामले को 2 दिसंबर तक के लिए स्थगित करने से पहले कहा कि अदालत एसआईआर प्रक्रिया की वैधता की स्वतंत्र रूप से जाँच करेगी।
बिहार के लिए एसआईआर का आदेश जून में दिया गया था। चुनौतियाँ लंबित होने के बावजूद, आयोग ने 27 अक्टूबर को तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल तक एसआईआर का विस्तार कर दिया। इन अभ्यासों के खिलाफ याचिकाएँ भी सुनी जा रही हैं। इसमें केरल के लिए 2 दिसंबर , तमिलनाडु के लिए 4 दिसंबर और पश्चिम बंगाल के लिए सुनवाई की तारीख 9 दिसंबर को निर्धारित है।
