नई श्रम संहिता श्रमिक‐विरोधी इससे न्याय, समानता और गरिमा का उल्लंघन: नायक

भोपाल: मध्य प्रदेश कांग्रेस के मीडिया प्रभारी डॉ. मुकेश नायक ने मंगलवार को केंद्र सरकार द्वारा 22 नवंबर 2025 से लागू की गई नई श्रम संहिताओं की कड़ी निंदा करते हुए इसे “श्रमिकों के कठिन संघर्षों से अर्जित अधिकारों पर सीधा हमला” बताया। प्रदेश कांग्रेस समिति कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में डॉ. नायक ने कहा कि 29 पुराने श्रम कानूनों को समाहित कर बनाई गई ये चारों संहिताएं “Ease of Doing Business” के नाम पर लागू की गई हैं, जबकि वास्तव में ये श्रमिकों को असुरक्षा, अस्थिरता और शोषण के नए युग में धकेल देती हैं।

उन्होंने कहा कि ये संहिताएं समानता, न्याय और गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन करती हैं। कांग्रेस पार्टी, उन्होंने कहा, श्रमिक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और इन संहिताओं को तुरंत वापस लेने की मांग करती है। इस अवसर पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता—एमपीसीसी महासचिव अनुपमा आचार्य, प्रवक्ता भूपेंद्र गुप्ता, रवी सक्सेना और विक्रम चौधरी उपस्थित रहे।

राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद औद्योगिक संबंध संहिता 2020, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता 2020 तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 अब कानून बन गई हैं। वेतन संहिता 2019 पहले ही लागू हो चुकी थी। डॉ. नायक ने बताया कि श्रम मंत्रालय ने अप्रैल 2021 से सभी चार संहिताओं को लागू करने की घोषणा की थी, जिसके तहत 29 केंद्रीय श्रम कानून स्वतः समाप्त हो जाएंगे।

उन्होंने आरोप लगाया कि नई संहिताएं श्रमिकों के अधिकारों को गंभीर रूप से कमजोर करती हैं। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वेतन संहिता की धारा 13 सरकार को न्यूनतम वेतन तय होने के बाद भी कार्य के घंटे निर्धारित करने का अधिकार देती है, जिसके चलते “सामान्य कार्य दिवस” को 10 या 12 घंटे तक बढ़ाया जा सकता है। व्यावसायिक सुरक्षा संहिता भले ही आठ घंटे कार्य दिवस का प्रावधान करती है, लेकिन ओवरटाइम से जुड़े नियम अस्पष्ट हैं और पूरी तरह सरकार के विवेक पर छोड़ दिए गए हैं, जिससे नियोक्ताओं को मनमाने ढंग से कार्य समय बढ़ाने की खुली छूट मिल जाती है।

उन्होंने याद दिलाया कि आठ घंटे का कार्य दिवस ऐतिहासिक मई दिवस आंदोलन की देन है और डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे भारत में लागू कराया था। नई संहिताएं पीढ़ियों से अर्जित श्रमिक अधिकारों को पीछे धकेलती हैं, इसलिए “कॉरपोरेट ताकतों और सरकार के इस श्रमिक विरोधी हमले” का मुकाबला करने के लिए इतिहास से सबक लेने की जरूरत है।

डॉ. नायक ने श्रम निरीक्षकों की शक्तियों को घटाकर “फैसिलिटेटर” मॉडल लागू करने और नियोक्ताओं को स्व-प्रमाणीकरण का अधिकार देने की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र श्रम न्यायालयों को कमजोर कर प्रशासनिक न्यायाधिकरणों को अधिक अधिकार देना न्यायिक प्रक्रिया को कार्यपालिका के हस्तक्षेप के लिए खुला छोड़ देता है।

उन्होंने 18,000 रुपये मासिक से अधिक वेतन पाने वाले पर्यवेक्षकों को ‘श्रमिक’ की परिभाषा से बाहर करने, फिक्स्ड-टर्म रोजगार को वैध बनाने, ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध, हड़तालों पर कठोर सीमाएं, फैक्टरी की परिभाषा में बदलाव और सुरक्षा मानकों में कमी जैसे पहलुओं पर भी गंभीर चिंता जताई। ये बदलाव, उन्होंने कहा, “मनमाने ढंग से नियुक्ति और बर्खास्तगी” को वैध बनाते हैं और करोड़ों श्रमिकों की नौकरी की सुरक्षा को खत्म कर देते हैं।

अंत में, डॉ. नायक ने कहा, “नई श्रम संहिताएं श्रमिकों पर सीधा हमला हैं और संविधान की मूल भावना का उल्लंघन करती हैं। कांग्रेस पार्टी श्रमिक वर्ग के साथ खड़ी है और इन संहिताओं को तत्काल वापस लेने की मांग करती है।”

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