इंदौर: नगर निगम शहर में सफाई व्यवस्था पर लाखों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है. नाले की सफाई केवल दिखावा है. कचरे को नाले से निकालकर किनारे पर छोड़ दिया जाता है, जिससे दुर्गंध और मच्छर पनपते हैं. बारिश में यही कचरा वापस पानी में बह जाता है, जिससे जलभराव की समस्या होती है. जब तक ठोस कचरा प्रबंधन प्रणाली नहीं बनती और किनारे के मलबे को पूरी तरह हटाया नहीं जाता, स्थिति में सुधार संभव नहीं है.
यह स्थिति शहर के कई नालों पर देखने को मिल रही है. बात करें प्रेमसुख टॉकीज के पीछे वाले नाले की, तो यहां नगर निगम द्वारा सफाई कार्य तो नियमित बताया गया है, लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग है. सफाई दल नाले से कचरा निकालकर उसे वहीं किनारे डाल देते हैं. यह कचरा महीनों तक ऐसे ही पड़ा रहता है, जिससे दुर्गंध, गंदगी और मच्छरों का प्रकोप बढ़ रहा है. यही कचरा बारिश के दिनों में फिर से पानी में बह जाता है.
नाले में बार-बार जमा होने वाला प्लास्टिक, कपड़ा, घरेलू कचरा और मिट्टी गंदे पानी के प्रवाह को रोक देते हैं, जिससे जलभराव की समस्या और बढ़ जाती है. जब तक ठोस कचरा प्रबंधन प्रणाली नहीं बनाई जाएगी और नाले किनारे पड़े मलबे को पूरी तरह हटाया नहीं जाएगा, तब तक सफाई पर कितना भी बजट खर्च हो जाए, स्थिति में सुधार संभव नहीं है. सवाल उठता है कि आखिर नगर निगम की दीर्घकालिक नीति कहां है?
यह बोले नागरिक
सफाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है, जबकि शहर के नालों की स्थिति जस की तस बनी हुई है. इस पर ध्यान देना पड़ेगा, क्योंकि हम स्मार्ट प्रोजेक्ट की ओर बढ़ रहे हैं.
– सलीम खान
एक तरफ नदी शुद्धिकरण की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ ठोस नीति के अभाव में लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं निकल पाता. गंदगी और दुर्गंध से लोगों में कई तरह की बीमारियां फैल रही हैं.
– प्रवीण मिश्रा
सिर्फ औपचारिकता न निभाई जाए, बल्कि भविष्य को ध्यान में रखते हुए स्थाई और प्रभावी सफाई नीति लागू की जाए, ताकि कम खर्चे में लंबे समय तक नालों की सफाई बनी रहे.
– आनंदीलाल पंचोली
