दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण उपायों में वाहनों की उम्र ही नहीं, बल्कि तय की गयी दूरी पर भी विचार करने की ज़रूरत : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली, 19 नवंबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वाहनों से होने वाले प्रदूषण का आकलन सिर्फ़ उनकी उम्र के आधार पर नहीं किया जा सकता है बल्कि वाहनों द्वारा तय की गई दूरी को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

प्रख्यात पर्यावरणविद् एमसी मेहता मामले में दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण से संबंधित मामलों की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि कुछ वाहन एक साल में 30,000 किलोमीटर से ज़्यादा चल सकते हैं, जबकि अन्य, जैसे आधिकारिक अदालती वाहन पाँच साल में 15,000 किलोमीटर भी नहीं चल पाते हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उन्होंने एक दिन पहले एक लेख पढ़ा था, जिसका हवाला देते हुये उन्होंने कहा “किसी वाहन की उम्र का प्रदूषण उत्सर्जन से कोई लेना-देना नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका कितना इस्तेमाल किया गया है।”

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने न्यायालय का ध्यान राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 10 वर्ष से अधिक पुराने डीजल वाहनों और 15 वर्ष से अधिक पुराने पेट्रोल वाहनों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाने वाले अपने पूर्व आदेश की ओर आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि जहाँ बीएस-4 वाहनों को जीआरएपी प्रतिबंधों से छूट दी गई है वहीं 15 वर्ष पुराने बीएस-3 वाहनों के लिए भी इसी तरह की छूट पर विचार किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने अपने आदेश में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को संबंधित हितधारकों से परामर्श के बाद वायु प्रदूषण कम करने के लिए उचित उपाय करने की अनुमति दी। वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने न्यायमित्र के रूप में न्यायालय की सहायता की। सीएक्यूएम की कार्रवाई रिपोर्ट की समीक्षा के लिए अब यह मामला मासिक रूप से सूचीबद्ध किया जाएगा।

पीठ ने सीएक्यूएम द्वारा ग्रेप – 3 के तहत प्रतिबंधों को ग्रेप -2 में करने के प्रस्ताव पर कहा कि प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से किसी भी प्रतिबंधात्मक कार्रवाई का स्वागत किया जाएगा लेकिन इस बात पर जोर दिया कि कार्यान्वयन से पहले सभी हितधारकों से परामर्श किया जाना चाहिए।

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