उच्चतम न्यायालय ने झारखंड विधानसभा नियुक्ति अनियमितता मामले पर सुनवाई के दौरान सीबीआई को लगायी फटकार

नयी दिल्ली, 18 नवंबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने झारखंड विधानसभा में नियुक्तियों और पदोन्नतियों में कथित अनियमितताओं की जाँच से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए मंगलवार को केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) से सवाल किया कि एजेंसी का इस्तेमाल ‘राजनीतिक लड़ाई लड़ने’ के लिए क्यों किया जा रहा है।

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ झारखंड उच्च न्यायालय के सितंबर 2024 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी जिसमें राज्य विधानसभा में कथित अवैध भर्तियों की सीबीआई जाँच का निर्देश दिया गया था।

उच्चतम न्यायालय ने नवंबर 2024 में उच्च न्यायालय के आदेश पर पहले ही रोक लगा दी थी। राज्य सरकार ने भी इसी आदेश के खिलाफ एक अलग विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है।

पीठ मंगलवार को इस मामले में प्रारंभिक जाँच करने की अनुमति मांगने वाले सीबीआई की एक अंतरिम आवेदन पर सुनवाई कर रही थी। मुख्य न्यायाधीश गवई ने इस समय अनुरोध पर विचार करने से इनकार करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता एसवी राजू से पूछा, “आप अपनी राजनीतिक लड़ाई के लिए इस तंत्र का इस्तेमाल क्यों करते हैं? हम आपको कई बार बता चुके हैं।”

झारखंड विधानसभा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा, “यह चौंकाने वाला है कि जब भी कोई मामला आता है, सीबीआई पहले ही उस अदालत में पेश हो जाती है।” इस पर श्री राजू ने कहा कि इस मामले में नहीं। जिसके जवाब में श्री सिब्बल ने जवाब दिया, “सिर्फ़ यहाँ ही नहीं, कई मामलों में। पश्चिम बंगाल में, माननीय न्यायाधीश ने इसे देखा है।” अतिरिक्त महाधिवक्ता ने इस पर जवाब दिया, “कारण स्पष्ट है, जब कोई अपराध होता है, तो हम पेश होते हैं।”

यह मामला झारखंड उच्च न्यायालय में एक सामाजिक कार्यकर्ता शिव शंकर शर्मा की ओर से दायर एक जनहित याचिका से उत्पन्न हुआ था। जनहित याचिका में विधानसभा में अवैध नियुक्तियों के संबंध में एक जाँच आयोग द्वारा चिन्हित 30 संदर्भ बिंदुओं के संबंध में तत्कालीन राज्यपाल द्वारा तत्कालीन अध्यक्ष को कथित तौर पर जारी किए गए 2018 के निर्देश को लागू करने की मांग की गई थी।
श्री शर्मा ने कथित अवैध भर्तियों की सीबीआई जाँच की भी माँग की थी। उच्च न्यायालय ने सितंबर 2024 में उनकी याचिका स्वीकार करते हुए सीबीआई को प्रारंभिक जाँच का निर्देश दिया था।

न्यायालय ने माना था कि राज्य के शीर्ष अधिकारियों की भागीदारी को देखते हुए निष्पक्ष, ईमानदार और पूर्ण जाँच सुनिश्चित करने के लिए और जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए मामले को सीबीआई जैसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपना आवश्यक था।

झारखंड विधानसभा ने तर्क दिया है कि उच्च न्यायालय ने राज्य पुलिस को दरकिनार करने के ठोस कारण बताए बिना प्रथम जाँच एजेंसी के रूप में सीबीआई जाँच का आदेश देकर गलती की।

पक्षकारों की ओर से आगे कुछ प्रस्तुतियों के बाद इस मामले के फिर से उठने की उम्मीद है।

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